शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

कवि, कविता और बयान

इन कविताओं का रचनाकाल 2006 के आसपास का है। बंगलौर आने से पहले मैं मप्र की जानी मानी शैक्षणिक संस्‍था एकलव्‍य में काम कर रहा था। एकलव्‍य में हर छह माह में तीन से चार दिन की एक ग्रुप मीटिंग होती है जिसमें संस्‍था के सभी सदस्‍य भाग लेते हैं। एकलव्‍य में मेरी पहचान एक कवि के रूप में स्‍थापित है। आमतौर पर ऐसी मीटिंग के अवसर पर मैं अपनी कविताएं मीटिंग स्‍थल के नोटिस बोर्ड पर चस्‍पा करता रहा हूं। 2006 की मीटिंग में मैंने कोई कविता नहीं लगाई। तो साथियों ने मुझसे यह सवाल पूछ लिया कविता कहां है। जिसके जवाब में मैंने वहीं ये दो कविताएं लिखीं। सामान्‍यतौर पर मेरी रचना प्रक्रिया यह है कि मैं अपनी कविताएं कम से कम 15 से 20 दिन के बाद ही सामने लाता हूं। पर यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि 'बापू के नाम चार कविताएं' मैंने लिखने के एक घंटे के भीतर ही ब्‍लाग पर पोस्‍ट कर दी थीं।

ये कविताएं पिछले दिनों आखरकलश पर पहली बार प्रकाशित हुई हैं। आखरकलश में भेजने से पहले मैंने इन्‍हें फिर से लिखा है। आपमें से कईयों ने इन्‍हें वहां पढ़ लिया होगा। अगर आपको अच्‍छी लगीं थीं तो दुबारा भी पढ़ ही सकते हैं।    


कवि भी एक कविता है
पढ़ो
कि कवि भी
एक कविता है
कवि
जो महसूस करता है
अंतस में अपने
वही अपनी उंगलियों की नोक से
उतारता है पेपर पर
या कि कम्‍प्‍यूटर पर

कवि
जो महसूस करता है
वह दौड़ता रहता है उसकी रगों में
वही उभरता है उसके चेहरे पर

कविता
जब तक पक नहीं जाती
(बेशक वह कवि का भात है)

या कि
जब तक वह उबल नहीं जाती
(बेशक वह कवि की दाल है)

या कि
जब तक वह पल नहीं जाती
(बेशक वह कवि की संतान है)

तब तक
छटपटाती है
कवि के अंतस में
छलकती है चेहरे पर

इसलिए
पढ़ो
कि कवि
स्‍वयं भी एक कविता है
बशर्ते कि तुम्‍हें पढ़ना आता हो!
              
कविता बिना कवि
कविता
के बिना
एक कवि का आना
शायद
उतना ही बड़ा आश्‍चर्य है
जितना
बिना हथियार के
घूमना ‘डॉन’ का

डॉन
शरीर पर चोट
पहुंचाता है
कवि
आत्‍मा पर वार करता है
शरीर की चोट
घंटों,दिनों,हफ्तों या कि
महीनों में भर जाती है
आत्‍मा
पर लगी चोट
सालती है
वर्षों नहीं, सदियों तक

इसलिए
कवि को आश्‍यर्च
नहीं होना चाहिए
कि उससे पूछा जाए
कहां है उसकी कविता ?
           0 राजेश उत्‍साही 


कविताएं आपने पढ़ ही हैं। टिप्‍पणी करने से पहले यह पढ़ते जाएं कि आखरकलश पर मित्रों ने क्‍या कहा था।  

रश्मि रवेजा के शब्‍दों में, ‘बहुत ही गूढ़ बात कही है, दोनों कविताओं में सचमुच कवि स्वयं भी एक कविता है ...और कवि की बातें ..आत्मा को झिंझोड़ डालती हैं.’ 

सुभाष राय ने कहा,. दोनों ही कविताएं बेहतरीन। कवि और कविता की व्‍याख्‍या करती हुई। ये जीवन अनुभव राजेश का होकर भी बहुतों का है, जो सही मायने में कविता से जुड़े हुए हैं।’  

आशीष बोले, ‘अगर कविताओं का कोई निहितार्थ है तो उसकी गूढता मुझे समझ नहीं आयी! (इसमें कौन सा नयी बात है?!!!!) लेकिन सतही तौर पे अपने लेवल के हिसाब से देखूं तो बेहद सीधे और सरल शब्दों में आपने अपनी बात कही है....सही है कवि भी कविता है....। 

 नीरज गोस्‍वामी  ने कहा, ‘राजेश जी आपकी दोनों रचनाएँ अप्रतिम हैं...प्रशंसा के शब्दों से परे हैं...सच्ची और सार्थक हैं...।’ 
 
दिव्‍या ने बात आगे बढ़ाई, ‘सुंदर कविताएं।’ कहकर। 

मनोज कुमार ने अपनी बात इस तरह कही, ‘इस कविता के माध्‍यम से कवि ने बौद्धिक जगत की दशा-दिशा पर पैना कटाक्ष किया है।’  
प्रदीप कांत ने कहा, ‘ कवि सरल नहीं जटिल कविता है। कवि पर अपनी तरह से विचार करती कविताएं।’  

मोनिका शर्मा ने कहा, ‘दोनों रचनाएं अच्छी लगी.... उत्साहीजी की कविताएं भावप्रधान होती हैं।’ 

शाहिद मिर्जा ‘शाहिद’ ने फरमाया, ‘कवि और कविता विषय पर बहुत ही शानदार कविताएं पढ़ने को मिलीं।’ 
  
सम्‍वेदना के स्‍वर आलोक चैतन्‍य  और सलिल ने अपनी बात कुछ इस तरह रखी,  ‘उत्‍साही जी की कविताएं सारगर्भित होती हैं और हृदय से निकलती है... और विशेष कर तब जब कविता ही कवि और कविता के रिश्तों को रेखांकित करती हो. दूसरी कविता पहले... एक सच्चा बयान..वंदे मातरम एक कविता ही तो है, मगर जब आनंद मठ में यह गीत गूंजता है तब पता चलता है कि यह एक गीत नहीं स्वतंत्रता का हथियार है... किंतु कविता मात्र छंदों और शब्दों में रची कविता नहीं यह एक सम्पूर्ण परिचय है एक कवि का... उत्साही जी, एकदम खरा बयान.
दूसरी कविता में आपने कवि को कविता बताया है और उसके हर रूप को दिखाया है, लेकिन अंतिम पंक्ति की आवश्यकता नहीं थी.. यह कवि को न पढ पाने वाले या पढ़ सकने वाले पाठकों या गुणग्राही जन पर प्रश्न चिह्न लगाती है. कवि का संदेश यहीं समाप्त हो जाता है कि पढो कि कवि भी एक कविता है. इसमें यह भाव स्पष्ट है, उजागर है कि जो कवि को एक कविता की तरह नहीं पढता और सिर्फ कविता को सम्पूर्ण मानता है, वह अनपढ है, उसे कविता का ज्ञान नहीं, एक अर्द्धसत्य है उसका ज्ञान।’  


उड़नतश्‍तरी पर सवार समीर जी ने कहा,’दोनों ही रचनाएँ अद्भुत हैं..आनन्द आ गया बांचकर।‘  

राजकुमार सोनी जी का बिगुल बहुत दिनों बाद मेरी रचनाओं पर बजा। उन्‍होंने कहा, ‘राजेश उत्साही जी हमेशा ही बेहतर लिखते हैं यहां प्रस्तुत उनकी दो रचनाएं इस बात का सबूत भी है.मैं उनसे हमेशा कुछ सीखता हूं।’ 
 
कोरल की तृप्ति ने कहा, ‘दोनों रचनाएं बहुत सुन्दर है।’ 

 कविता रावत ने कहा, ‘ कहां है उसकी कविता ?...सही सवाल! ...उत्साही जी की काव्यधर्मिता के अनूठी प्रस्तुति के लिए आखर कलश को हार्दिक धन्यवाद और उत्साही जी को सारगर्भित रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।’ 

वंदना बोलीं,’ कवि भी एक कविता है……………क्या भाव उँडेले हैं जो रगों मे लहू बन कर दौडे वो कविता ही तो है कवि और कविता एक दूसरे से जुदा कब हैं। कविता बिना कवि……………फिर तो उसका अस्तित्व ही नहीं है……………।जैसे बिना डोर के पतंग्……………भावों का खूबसूरत समन्वय किया है।’  

मुकेश कुमार बोले,’ कवि स्‍वयं में कविता है। कवि क्‍यों भैया,हर किसी की जिन्‍दगी खुद में कविता है।’  

प्रतुल जी ने अपनी बात कविता में ही कही,
अब तक 
कवि को 
कविता ने 
दिलायी थी प्रतिष्ठा. 
आपकी सदाशयता है कि 
आप पुरजोर अपील कर 
करते हैं पाठको के मन के भीतर 
कवियों की सुदर प्राण-प्रतिष्ठा. 

आपके 
स्वागत के 
उठे हाथों को 
सम्मान देते हुए 
मेरी दृष्टि की 
आपके चरणों की ओर 
हो रही है निष्ठा
.

संजीव गौतम ने कहा, ‘राजेश जी की दोनों कविताएं अच्छी हैं। गहरे अर्थ लिए हुए हैं। पहली कविता देखने में साधारण लेकिन अपने में बहुत कुछ समाये हुए है। जो लोग लेखन में कुछ और, निजी जीवन में कुछ और हैं उन पर व्यंग्य भी है। कवि कर्म की स्पष्‍ट व्याख्या है। कविता का सृजन वास्तव में तुकबन्दी नहीं है। एक-एक ब्द को बरतना है, उसे जीना है।’ 


बबली बोलीं,’ ‘बहुत सुन्दर, भावपूर्ण और शानदार रचनाए ! बेहतरीन प्रस्तुति!’ 

आरती ने कहा, Very nice you have pover to make readers।’

राजीव ने अपनी बात कुछ इस तरह कही,
"जब तक वह पल नहीं जाती
(
बेशक वह कवि की संतान है)
तब तक
छटपटाती है
कवि के अंतस में
छलकती है चेहरे पर
झांकती है आंखों से" 


इस मर्म को एक कवि से बेहतर बस एक मां ही समझ सकती है .आपने तो सारे कवियों की आन्तरिकता को ही उजागर कर दिया बड़े भैया। संतुलित गतिशीलता और सुंदर शिल्प ने इसे अत्यंत सुग्राह्य बना दिया है.इससे आगे कहने की शायद क्षमता नहीं है अभी मुझमें.इसका सामान्यीकरण इसका मजबूत पक्ष है ,ऐसा मुझे लगाता है।’

निर्मल गुप्‍त ने अपनी निराशा जाहिर की,‘ उत्साही जी जैसे वरिष्ठ साहित्यकार से हम कुछ बेहतर कविता की आस लगाये थे -पर यह दोनों कविताएँ तो एकदम साधारण हैं।  

दिगम्‍बर नासवा बोले, ‘वाह ... बहुत ही लाजवाब ... कवि के अंतर्मन को , उसकी आत्मा को शब्दों में लिखना आसान नही होता पर आपने कर दिखाया ..... कविता सच में छटपटाती है कवि के मन में .... जब तक शब्दों को उचित भाव नही मिलते कवि कविता को अंदर ही रखता है और छटपटाता रहता है .... दोनो बहुत ही सशक्त  रचनाएं हैं ....। 

संजय ग्रोवर ने कहा, ‘राजेश उत्‍साही said... ' "आशीष भाई सही कहा आपने नया कुछ भी नहीं है। बस मुझे लगा कि मैंने जानी पहचानी बात को नए तरह से कहा है। आखिर हम कवि लोग और करते क्‍या हैं? वैसे कविता आपको जितनी समझ आई, उतनी ही है।’(यह मैंने आशीष की टिप्‍पणी के जवाब में कहा था।)
इस मायने में अच्छी कविताएं हैं, पढ़ने को मजबूर करती हैं।

बोले तो बिन्‍दास के रोहित जी बोले, ‘हमें सरल शब्दों में कविता के अर्थ समझ में आए..हमारे लिए यही कविता है। कविता जो भाव है .भाव का शब्द रूप है।’

देवी नागरानी ने कहा, ‘सच शब्‍दों में साकार हुआ है और मैं चुप।‘ 

शेखर सुमन,राकेश कौशिक और हास्‍य फुहार को भी कविताएं अच्‍छी लगीं। 

अब आप क्‍या कहते हैं?


शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

बापू के नाम चार कविताएं

मैंने एक चलन देखा है। हममें से अधिकांश बरसाती मेंढकों की तरह किसी भी दिवस के आते ही टर्राने लगते हैं,वैसे चाहे उस विषय पर कभी न कुछ कहते हों और न सोचते हों। हमने हर चीज के लिए एक दिन तय कर लिया है, हम बस केवल उस एक दिन सारा चिंतन करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री समझ लेते हैं। मुझे पता है मेरी यह बात पढ़कर बहुत-सों की भौहें तन जाएंगी और वे मुझ पर लानत भेजने लगेंगे। पर मैं भी क्‍या करूं। आज गांधी बब्‍बा का दिन है और वे तो सच बोलने के लिए ही कहते थे न। तो मुझ से रहा नहीं जा रहा। अब आज तो कम से कम झेल ही लीजिए। मौसम का साथ देते हुए मैंने भी चार कविताएं टर्रा दी हैं।

-एक-
आज सुबह से
मैं बापू को ढूंढ रहा था
कि वे मिल जाएं कहीं
तो मैं उन्‍हें जन्‍मदिन की बधाई दे दूं
क्‍योंकि दो दिन पहले ही मुझे इस बात का
कुछ कुछ विश्‍वास हुआ 
कि सचमुच
महात्‍मा इस देश में ही जन्‍मे थे

दो दिन पहले 
एक रूका हुआ
फैसला आया है
उस सवाल पर जो बापू
के जाते ही खड़ा हो गया था

यह अलग बात है कि
बहस जारी है
सही है या गलत
कानून की देवी क्‍या सचमुच अंधी है
आस्‍था का पलड़ा भारी है या सबूतों का
फैसला इतिहास का हुआ है
या कानून का
फैसला अदालत में हुआ है या संसद में
फैसला न्‍याय का है या राजनीति का
यह फैसला है या समझौता

मैं न तो राजनीतिज्ञ हूं, न इतिहासकार हूं, न कानूनविद्
और न धर्मपरायण व्‍यक्ति
हां, इस देश का एक
साधारण नागरिक हूं

फिलहाल संतुष्‍ट हूं कि
मैं अपने मित्र के साथ
आंख मिलाकर बात कर सकता हूं।


-दो-
महात्‍मा
मुझे एमजी रोड पर
भी नहीं मिले और न मिले
एमजी चौराहे पर
महात्‍मा गांधी सार्वजनिक भवन में भी वे नजर नहीं आए
हां उनका बुत जरूर वहां था

फूलों की दो-तीन मालाएं उनके गले में पड़ी थीं
कुछ लोग थोड़ी देर पहले ही
रघुपति राघव राजाराम गाकर
पास के बार-कम-रेस्‍टोरेंट में गए थे

एक कौआ उनकी नाक पर बैठकर
अपनी चोंच साफ कर रहा था।

-तीन-
मुझे
विश्‍वस्‍त सूत्रों से
पता चला है कि
असल में
महात्‍मा रिचर्ड एटनबरो की
फिल्‍म में भूमिका करने के बाद से गायब हैं
 
कुछ समय पहले
‘लगे रहो मुन्‍ना भाई’ फिल्‍म में
संजयदत्‍त को दिखाई दिए थे

और फिर ‘मैंने गांधी को नहीं मारा ’
फिल्‍म में यह कहने आए थे कि
सचमुच मुझे इन्‍होंने क्‍या किसी ने नहीं मारा
मैं तो अपनी ही मौत मर गया हूं

यकीन न हो तो 
सरकारी स्‍कूल के
बच्‍चों की पाठ्यपुस्‍तकों के तीसरे या चौथे आवरण पर
मेरी तस्‍वीर देख सकते हो
संदेश के साथ।

-चार-
बच्‍चे
मुझे नाम से जानते हैं
और शायद काम से भी
वे जानते हैं कि आज के समय में
वे महात्‍मा नहीं बन सकते
इसलिए बस मेरी जीवनी पढ़ते हैं
परीक्षा में निबंध लिखने के लिए या 
फिर करोड़‍पति इनाम जी‍तने के‍ लिए

बच्‍चे भी आखिर क्‍या करें
गांधी! गांधी! गांधी! गांधी! गांधी!
गांधी के नाम का इतना चर्चा है
इस देश में कि
बच्‍चों को समझ ही नहीं आता
किस गांधी की बात हो रही है

बच्‍चों की बात छोडि़ए
क्‍या आपको समझ आता है?
                                 0 राजेश उत्‍साही
(मित्रो मुझे पता है मेरी यह अभिव्‍यक्ति बहुत सुंदर है, सटीक है,सशक्‍त है,मुखर है,भावपूर्ण है,मार्मिक है आदि आदि है। इसलिए इन विशेषणों का उपयोग करके अपने शब्‍द जाया न करें। कुछ और भी कहें अपनी टिप्‍पणी में। शुक्रिया।)

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

नया जन्‍म: नीमा के बहाने: समापन किस्‍त

मित्रो जैसा कि आप जानते हैं मैं अपनी धर्मपत्‍नी नीमा पर एक लम्‍बी कविता लिख रहा था। उसके एक, दो, तीन भाग पहले यहां आप पढ़ चुके हैं। यह उसकी चौथी और समापन किस्‍त है। यह कविता नीमा के प्रति मेरी एक सार्वजनिक आदरांजलि है। बहुत संभव है इसका कोई साहित्यिक महत्‍व न हो।




तमाम कोशिशों के बावजूद
आदर्शों पर खरे नहीं उतर पाए थे हम
परम्‍परा से चली आ रही
तकरार हमारे घर
में भी मौजूद थी
घर से
बाहर जाने का
रास्‍ता चुनना पड़ा था हमें
कुछ व्‍यवहारिकताएं थीं
और कुछ समझौते
 
सबकी सहमति के बाद
साल भर के नन्‍हें कबीर को लेकर
हम आ गए थे भोपाल

तुमने
अपना सारा समय उसे,मुझे
और घर संभालने में लगा दिया था
पांच साल गुजर गए

सोचा था कबीर स्‍कूल जाने लगेगा
तो तुम्‍हारे पास समय होगा
कुछ और करने का
कबीर और उत्‍सव के साथ 

पर नियति को कुछ और मंजूर था
कबीर के बाद उत्‍सव
और फिर
दोनों को संभालने में
तुम्‍हारा पूरा समय
मुझे मेरे दफ्तर और चकमक से 
फुरसत ही कहां थी

दस साल में दुनिया
कहां से कहां पहुंच जाती है
नर्मदा में बहुत पानी बह गया था
तुमने जो महाविद्यालय में पढ़ाया था
वह सब पुराना हो गया था
नए से तुम्‍हारा वास्‍ता नहीं बन पाया था

हमने कोशिश की थी
भोपाल के कुछ प्राइवेट स्‍कूलों में
पढ़ाने का काम खोजने की
काम मिला भी था
पढ़ाने भर नहीं पूरा स्‍कूल संभालने का

मतलब
तीन कमरों में भरे बीस-तीस बच्‍चे और
उन्‍हें पढ़ाने वाले तीन चार अप्रशिक्षित
युवक-युवतियां
मानदेय की राशि इतनी कि
घर से स्‍कूल तक जाने-आने का खर्चा
भी नहीं निकल पाए

शायद
अंदर ही अंदर
तुम कुंठित होकर
अवसाद में घिर रही थीं
अनिद्रा का शिकार होने लगीं थीं
याद है मुझे 
एक बार लगातार पांच-छह रात 
तुम सोयी नहीं थीं
हमें अंतत:
च‍िकित्‍सक और फिर
मनोचिकित्‍सक की सलाह लेनी पड़ी थी

उसने ही सुझाया था
दवाओं पर निर्भर न रहें
अपने आत्‍मबल को जगाएं
योग करें
जो है आपके पास उसे पूरी तरह जिएं
जो नहीं है उसके बारे में सोचकर समय
जाया न करें

तुमने जगाया था
अपना आत्‍मबल
खुद ही खोज निकाला था
घर से चंद कदम की दूरी पर 
एक योग केन्‍द्र
और जाने लगीं थीं वहां सुबह सुबह
योग गुरु हेमलता सिघंई और शोभा बोन्द्रिया के साथ

देखते ही देखते
अवसाद से उभर आईं थी तुम
योग केन्‍द्र की
सबसे चहेती शिष्‍या बन गईं थीं
जब दूसरे शिक्षक नहीं आते थे,
तुम उनकी जिम्‍मेदारी संभालने लगीं थीं
सचमुच
योग ने तुम्‍हारे अंदर एक
नई नीमा को जन्‍म दिया था


आज तुम
पिछले आठ सालों से  
योग केन्‍द्र चला रही हो
वह भले ही तुम्‍हें ‘अर्थ’ न दे पाया हो
पर उसने तुम्‍हारी जिंदगी को एक अर्थ दे दिया है
अपने को स्‍वस्‍थ्‍य रखने के साथ साथ
औरों तक यह संदेश पहुंचा रही हो

इतना ही नहीं 
इस बीच
तुमने सीखा था वर्गपहेली बनाना
यकीन करना ही होगा
कि शाम के एक अखबार के
शब्‍द संसार कालम के लिए प्रतिदिन
तुमने दस साल तक बनाई वर्गपहेली


उसके मानदेय से
आए घर में फ्रिज,वाशिंग मशीन
दीवान और ऐसी तमाम चीजें
और उससे भी महत्‍वपूर्ण यह है कि
वह खोया हुआ भाव कि
तुम्‍हारे होने का भी कुछ अर्थ है 
तुम अकारथ नहीं हो

नीमा
घर से सोलह सौ किलोमीटर दूर
जाने की हिम्‍मत तुमने ही दी मुझे
बच्‍चों के बीच मां और पिता की
दोहरी जिम्‍मेदारी तुमने ही उठाई है
अब इससे ज्‍यादा क्‍या कहूं
कि 
तुमने एक व्‍यवहारिक पत्‍नी की भूमिका
हर पल निभाई है
मैसूर के पास श्रीरंगपटना में टीपू सुल्‍तान
के महल के परिसर में (25 जून, 2010)

हम 
साथ-साथ हैं
और रहेंगे
आज की बस इतनी 
और इतनी ही सच्‍चाई है।
                          0 राजेश उत्‍साही

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

लिखकर एक कविता

आप जानते हैं,इन दिनों मैं गुलमोहर पर नीमा के बहाने  एक लम्बी कविता लिख रहा हूं। इस कविता की तीन किस्तें आ चुकी हैं। चौथी अभी रची जा रही है। इस बीच आपको भी लग रहा होगा और मुझे भी लग रहा है कि चुप्पी कुछ ज्यादा ही लंबी हो गई है। इस चुप्पी को तोड़ने के लिए मैं अपनी एक  कविता यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। यह गुलमोहर पर पहली बार आ रही है। हां ई-पत्रिका गर्भनाल के जुलाई अंक में यह प्रकाशित हो चुकी है। संभव है आप में से कुछ ने इसे वहां  पढ़ लिया होगा। अगर आपको यह कविता अच्छी लगी होगी तो दुबारा पढ़ने में भी आप प्रसन्नता महसूस करेंगे।   * राजेश उत्साही

लिखकर
एक कविता महसूस
करता हूं मैं
जैसे कई रातों की उनींदी आंखें
दिन-दिन भर सो उठती हैं तरोताजा होकर

एक
कविता लिखकर
महसूस करता हूं मैं
जैसे कोई गर्भणी सफल प्रसव के बाद
मातृत्व के उल्लास से
भर उठती है

जैसे
एक पिता
अपने नवजात शिशु को दुलारकर
भूल जाता है सृष्टि की नश्वरता

महसूस
करता हूं मैं
लिखकर एक कविता

जैसे
एक मेहनतकश भर दोपहरी में
रोटी पर रखकर प्याज
नीम तले
करता है ब्यालू
पीता है ओक से
लोटा भर पानी
और निकाल फेंकता है
सारी थकान
लेकर एक लम्बी डकार

लिखकर
महसूस करता हूं मैं
एक कविता

जैसे
घूमते हुए चाक पर
गीली मिट्टी से गढ़कर ठण्डा पानी
रोमांचित हो उठता है उसका सृजनकार

कुछ कुछ वैसा ही
महसूस करता हूं मैं
लिखकर
एक कविता।
* राजेश उत्साही

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

वर्मा मैडम बनाम बड़ी बहू ।। नीमा के बहाने : तीन

नीमा के बहाने का तीसरा भाग प्रस्‍तुत है। हो सकता है यह आपको एक सपाट बयानी लगे। कविता कम कहानी ज्‍यादा लगे। सच तो यही है कि कहानी को ही कविता में कहने की कोशिश कर रहा हूं। नए पाठक कृपया इस कविता का संदर्भ समझने के लिए कविता के पहले और दूसरे भाग भी पढ़ें तो बेहतर रहेगा।


नीमा
मैंने
तुमने 
हमने
शुरू किया था
नया जीवन

इसमें
नया
उतना ही था
जितना होता है सबके लिए


तुम 
हिन्‍दी साहित्‍य
की प्राध्‍यापिका
सेंधवा के छोरा-छोरियों की वर्मा मैडम
आईं थीं होशंगाबाद पटेल साहब की बहू
बड़ी बहू बनकर
पूरी रेल्‍वे कालोनी में थी चर्चा
पटेल साहब की बहू कॉलेज में पढ़ाती है

मैं खुश था
अम्‍मां खुश थीं
बाबूजी खुश थे
सब खुश थे कि तुम पढ़ा रही हो
कॉलेज में पढ़ा रही हो

दुख था
तो केवल यह कि
बहुत दूर था सेंधवा
नर्मदा
होशंगाबाद को भिगोती और  
तीन सौ किलोमीटर का फासला पार करके
सेंधवा के आसपास खलघाट
को छूती

तुम जानती हो कि
कितनी कोशिशें हुई थीं
तुम्‍हारा तबादला
होशंगाबाद या कहीं आसपास हो जाए
बाबूजी शिक्षा मंत्री के दरवाजे तक हो आए थे 
पर तदर्थ नियुक्ति के कारण
यह संभव नहीं हो सका था

नीमा
सच ये भी है कि कुछ
मध्‍यमवर्गीय आदर्श थे जिनके
तले मैं भी था और तुम भी

यह भी यर्थाथ था
मुझ से छोटे तीन और भाई बहन थे 
घर में
दादी और अम्‍मां बाबूजी भी थे
अम्‍मां ही थीं जिन्‍होंने सारा घर संभाल रखा था
मदद याकि हाथ बंटाने के लिए
स्‍वाभाविक रूप से जो आ सकता था
वह बडे़ बेटे की बहू
मेरी पत्‍नी
तुम थीं

तुमने भी देखा
महसूस किया
भावनात्‍मक, नैतिक और कुछ तथाकथित सामाजिक दबाव
तुमने यह फैसला किया, नहीं
शायद
हम दोनों ने यह फैसला किया
तुम केवल पटेल साहब कि बड़ी बहू बनी रहो

याद है
हम दोनों बसंत की सत्‍ताईसवीं नाव में सवार थे
लगता था जैसे
मिलकर दोनों ने पतवार नहीं संभाली तो
पता नहीं कब किनारें लगें

शायद
हमारे फैसले को पकाने में
विछोह के नमक का भी हाथ था

अंतत:
त्‍यागपत्र लिखकर
तुम चलीं आईं थीं
तुम आ गई थीं
बड़ी बहू बनकर

तुमने
अपनी ओर से यह प्रयत्‍न
किया था
निभा पाओ दायित्‍व अपना
पर कहीं कुछ ऐसा था जो आड़े आता रहा

इस बीच
तुम्‍हारे छोटे भाई ने सूचना दी कि
अभी तक त्‍यागपत्र स्‍वीकृत नहीं हुआ है
एक बार फिर
सब कुछ सोचा गया
हमने तय किया कि
तुम वापस जाकर
सेंधवा के छोरा-छोरियों की वर्मा मैडम हो जाओ
तैयारी हो गई थी
छोटा भाई तुम्‍हें
लेने आया था

लेकिन
तुम्‍हारे और अम्‍मां के बीच
जाने क्‍या बातचीत हुई कि
तुमने अपना फैसला
अचानक बदल दिया

नीमा
तुम शायद
नहीं जानतीं
कितने दिन और कितनी रातों तक  
मैंने महसूस किया जैसे
मैं गर्म तवे पर बार बार गिराई जारी कोई बूंद हूं
सच कहूं तो आज तक
मैं उस अपराध बोध से मुक्‍त नहीं हो पाया हूं

शायद
तुमने भी मुझे
अब तक
माफ नहीं किया है न!
0  राजेश उत्‍साही
(कविता अभी और भी है.....)

शनिवार, 17 जुलाई 2010

रानी लक्ष्‍मीबाई ।। नीमा के बहाने : दो


दोस्तो मेरी जीवनसंगिनी पर केन्द्रित कविता का दूसरा भाग प्रस्तुत है।कविता को अच्‍छी तरह आत्‍मसात करने के लिए नीमा के बहाने: एक  भी पढ़ें तो बेहतर रहेगा। 


नीमा
यानी निर्मला के आत्‍मज
कभी उत्‍तरप्रदेश के बीहड़ों से
निकलकर
महाराष्‍ट्र और गुजरात की सीमा से सटे मप्र के
पश्चिम निमाड़ की उपजाऊ जमीन
में आ बसे थे
परमार राजाओं के गढ़ सेंधव यानी
सेंधवा में
किले के नीचे

सेंधवा
रहा है मशहूर
अपनी रुई की गरमाहट के लिए
आज का आगरा बंबई मार्ग यानी
राष्‍ट्रीय राजमार्ग क्रमांक तीन इसके बीच से गुजरता है
यहीं 1959 के साल की पहली तारीख को
नीमा ने पहली किलकारी भरी

जीन में फिटर हुआ करते थे पिता
अस्‍सी साल की पकी उम्र में
उन्‍होंने इस दुनिया से ली विदा 
उनके जाते ही
जैसे परिवार बिखर गया
घर का सुख जाने किधर गया 

तीन भाइयों की दो बहनों में से एक
छोटे भाई से बड़ी लेकिन सबकी लाड़ली बहन
नीमा अभी छोटी ही थी
बड़े भाई अपने परिवारों में व्‍यस्‍त हो गए
 बहनें,छोटा भाई और मां जैसे उनके लिए अस्‍त हो गए

बचपन
मुफलिसी का खिलौना था 
मुफलिसी ही पालना था मुफलिसी ही बिछौना था
पिता का बनाया कच्‍चा घर और खुद्दारी ही गहना था
नन्‍हीं और नाजुक उंगलियां फूलों से जूझती थीं 
और खेल खेल में हीं उन्‍हें माला में गूंथती थीं
माला जो मंदिरों में जाती थी 
समय के बायस्‍कोप ने ऐसे मंजर भी दिखाए
गिरवी रखने को न जेवर बचे थे, न बरतन  
रोटी के लिए तवे पर रखे आटे को बेच आए
परीक्षा की फीस जो चुकानी थी 
मां ने किया था तय
बच्‍चों की पढ़ाई नहीं छुड़वानी थी

घर से स्‍कूल जाती-आती
हुई यह लड़की
रास्‍ते में कबीट के पेड़ से यह सब बतयाती
अपना सुख-दुख सुनाती
पेड़ सुनता
गुनता और जैसे कहता
बिटिया जीवन मेरी तरह है कंटीला
मेरी पत्तियों की तरह खट्टा ,मेरे फल की तरह कठोर
लेकिन अंदर से रसीला
 इस दुनिया में ही है तेरी ठौर  

समय बीतता गया
मुफलिसी के खिलौने टूटते गए   
जिंदगी में यकीन जीतते गए

सेंधवा के
मोती बाग मोहल्‍ले की
दगड़ी बाई प्राथमिक कन्‍या शाला की य‍ह कन्‍या
लड़कियों से ज्‍यादा लड़कों के साथ नजर आती
कंचे चटकाती  
गिल्लियों को दूर दूर तक पहुंचाती
मोहल्‍ले के घरों के कांच तड़काती
पर लड़की थी कि बाज नहीं आती

मिडिल स्‍कूल में
नाले के पार लड़के-लड़कियों के साथ पढ़ने जाती
और जब कोई बदतमीजी पर आता 
एक ही धक्‍के में सीधा खानदेश पुल से नाले में जाता
लड़के थे कि खिसयाते
और रानी लक्ष्‍मीबाई कहकर चिढ़ाते

सेंधवा महाविद्यालय
की दीवारें और उन पर लिखी इबारत
इस बात की देती हैं गवाही 
कि नीमा ने यहां अपनी बात मनवाई 
महाविद्यालय की चौखट में
छात्रा के रूप में कदम रखा
छात्रसंघ की अध्यक्षा का स्‍वाद चख्‍खा,
खो खो और कबड्डी खेली,
फर्राटा दौड़ लगाई और प्रतिद्वंदिता झेली
हिन्‍दी साहित्‍य की स्‍नातकोत्‍तर कक्षा में पढ़ा 
और फिर पांच साल पढ़ाया
परिवार से ज्‍यादा शायद अपना ही मान बढ़ाया


नीमा
आम आदमी की भाषा के
कवि सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की कविताओं में प्रयोगवाद 
पर शोध की तैयारी में जुटी थीं
पर वक्‍त ने कुछ इस तरह करवट ली 
कि वे दिल के हाथों लुटी थीं
सब कुछ तज के
मुझ जैसे आम आदमी की जिन्‍दगी के
वादों और विवादों की साक्षी बन गईं

नीमा के लिए
मैं वो आम आदमी था
जो उनके अलावा किसी और की
कसौटी पर खरा नहीं उतरता था
हां, मां ने
नीमा की मां ने कहा था
तुझे पसंद है तो मुझे क्‍या
तेरी खुशी में मेरी खुशी है

नीमा
ससुराल में बड़ी बहू बनकर
परिवार संभालने के
आदर्श की सनातन रंगबिरंगी झालरों
के बीच खो गईं 
सपनों का कैनवास जो सज रहा था 
उसे वक्‍त की लहर धो गई

गिनाने को कारण और देने को तर्क बहुत सारे हैं
पर हकीकत यही है कि मन के आगे कुछ निर्बलताएं उनकी रहीं
कुछ फरमान हमारे हैं

नर्मदा के किनारे  
होशंगाबाद के सेठानी घाट 
पर मधुमास में
 निर्मल नीर में उतराते चांद को निहारते हुए 
उजियारी रात में
मैंने पूछा था,
‘नीमा तुम्‍हारी जिन्‍दगी का लक्ष्‍य क्‍या है?’
‘तुम मिल गए तो लक्ष्‍य भी मिल जाएगा
साथ साथ हम रहें, यह जाता हुआ समय लौटकर न आएगा।‘
इसका जवाब  
निर्मल चांद को चूम कर ही दिया जा सकता था ।

नीमा
छोटे भाई की भाभी
और बहनों के लिए भाभी से ज्‍यादा
सहेली बन गईं
जल्‍द ही
हल्‍दी का रंग
और रसोई की प्‍याज की गंध उनमें
और वे गृहस्‍थी में रम गईं ।
 0      राजेश उत्‍साही 

(कविता अभी और भी है....इंतजार करें .)

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