सोमवार, 5 जुलाई 2010

निर्मला,नीमा,नीमू ।। नीमा के बहाने : एक


अपनी जीवनसंग‍िनी पर केन्द्रित यह कविता में पिछले साल भर से लिख रहा हूं। बीत गई 23 जून को हमारे वैवाहिक जीवन की रजत जयंती थी। सोचा था इस अवसर पर उन्‍हें इस कविता के माध्‍यम से शुभकामनाएं दूंगा। पर कविता पूरी नहीं हो सकी। अभी भी नहीं है। सोचता हूं कि जितनी है उसे यहां दूंगा तो उसे पूरी करने का नैतिक और भावनात्‍मक दबाव मेरे कवि पर बनेगा। तो जहां तक अभी पहुंच पाया हूं, उसे आप भी पढ़ें। 

मेरी
जीवनसंगिनी
यानी कि पत्‍नी का नाम
निर्मला है
यह असली नाम है
बदला हुआ या काल्‍पनिक नहीं
पर हां प्‍यार से
या समझ लीजिए सुविधा से
मैं नीमा कहकर बुलाता हूं।

समस्‍या
निर्मला कहने में भी नहीं
पर पुकारते हुए कुछ ज्‍यादा ही
समय लगता है
और अब तो उन्‍हें भी
मुझसे नीमा सुनने की कुछ ऐसी आदत
सी हो गई है
कि मेरे मुंह से निर्मला
सुनत ही उन्‍हें लगता है कि कुछ गड़बड़ है।

मुझे याद है
जब नई नई शादी हुई थी
मेरी मौसेरी बहन
जिसे हम सरू पुकारते हैं
अपनी नई-नवेली भाभी को
उस जमाने के एक मशहूर वाशिंग पावडर
के नाम से जोड़कर
चिढ़ाती थी।

याद मुझे यह भी है कि
मेरे एक साहित्यिक मित्र
ब्रजेश परसाई ने
-जो अब नहीं हैं-
बधाई देते हुए कहा था
अब आप राजेश जी को
निर्मल वर्मा बना दें
संयोग की बात यह भी
कि निर्मला का सरनेम भी वर्मा ही है
और अब भी है।

जानने वाले परेशान हो जाते हैं
राजेश उत्‍साही,निर्मला वर्मा और बच्‍चों के नाम
के साथ पटेल सरनेम देखकर।

यह अलग बात है कि
वे अपना परिचय श्रीमती निर्मला राजेश
कहकर देती हैं
जो मुझे कभी अच्‍छा नहीं लगता
मैं हर औपचारिक जगह उनका परिचय
श्रीमती निर्मला वर्मा कहकर ही देता हूं।

पर मेरे कहने से क्‍या होता है
आसपड़ोस वाले उन्‍हें
श्रीमती उत्‍साही के नाम से जानते हैं।

एक मजेदार बात यह भी कि
एक बार मैंने घर के बाहर
नेमप्‍लेट की तरह
एक स्‍लेट पर अपने नाम के साथ साथ
पत्‍नी और
बच्‍चों के नाम भी लिखकर
लटका दिए थे
लिखा था
राजेश नीमा
कबीर उत्‍सव
नतीजा यह कि
एक पड़ोसी नीमा को मेरा
सरनेम ही समझने लगे थे
वे मुझे नीमा जी कहकर ही
बुलाते थे
मैं और नीमा सुनसुनकर बस हंसते थे।

निर्मला यानी नीमा
अपने मायके में नीमू हैं
नीमू दीदी या फिर नीमू बुआ
और ससुराल में तो वे निर्मला ही ठहरीं
अब आपको
जो भी ठीक लगे
आप बुला सकते हैं
नीमा,निर्मला या फिर नीमू।

नाम का चयन
इसलिए भी जरूरी है कि
क्‍योंकि आगे की कविता इन्‍हीं के बारे में है
चलिए
मैं तो नीमा कहता रहा हूं
सो नीमा ही कहूंगा
एक बार फिर आपको याद दिला दूं
कि यह काल्‍पनिक या परिवर्तित नाम नहीं है
एकदम सोलह आने सच्‍चा और खरा है
                     **राजेश उत्‍साही 

(इस कविता का अगला भाग जल्‍द ही..)

28 टिप्‍पणियां:

  1. राजेश जी! आज ख़ड़गसिंह बनकर नहीं आया... बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है, साथ ही जीवन संगिनी को पूर्वांगिनी के रूप में स्वीकार करने की स्वीकारोक्ति...
    “चिड़ाता है” को “चिढ़ाता है” कर लें, निश्चय ही टाइपिंग की त्रुटि है.
    अब आपको जो भी अच्छा लगे बुला सकते हैं नीमा, निर्मला या नीमू... सोचना पड़ेगा.
    नीमा आपका अधिकार है जो सर्वाधिकार सुरक्षित है...निर्मला कहने के लिए उम्र की विवेचना करनी होगी और नीमू दीदी में कोई आपत्ति नहीं...चलिए ये मज़ाक था...
    कविता के पूरे होने का इंतज़ार रहेगा, अत्मीयता छूती है कविता की हर पंक्तियों में...

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  2. कविता का धरातल पता चला...अब आगे की कविता का इंतज़ार है.

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  3. @सम्‍वेदना के स्‍वर मेरे लिए तो खड़गसिंह ही हैं। शुक्रिया त्‍वरित टिप्‍पणी के लिए। त्रुटि की ओर ध्‍यान दिलाने के लिए भी शुक्रिया। यह टायपिंग की त्रुटि नहीं थी,वरन वैसी ही त्रुटि थी जैसी ऐसे शब्‍दों के बीच अक्‍सर होती है। मैंने संशय दूर करने के लिए शब्‍दकोष का सहारा भी लिया था,पर चिड़चिड़ाहट शब्‍द देखकर वापस आ गया। जब आप की टिप्‍पणी देखी तो फिर शब्‍दकोष पलटा। आप सही हैं। मैंने संशोधन कर दिया है।
    जब आपने टिप्‍पणी की थी तब फोटो नहीं था,अब फोटो भी है। तो आप तय कर सकते हैं कि किस नाम से बुलाएं। अब जब सम्‍वेदना के स्‍वर साथ हैं तो कविता पूरी करनी ही होगी। शुभकामनाएं।

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  4. Rajesh Bhaiya, aapki Nima hamari nirmala bhabhi....:)......puri kavita se aapke nimal mann ka pata chalta hai, aur ye bhi lagta hai aapke nimal hona ka karan Nirmala bhabhi hain........hai na!!..:)

    aapki kavita pe tippani karun, ye jayaj na hoga......!!

    next post ka intzaar main bhi karunga...!

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  5. सुन्दर, कविता कब पूरी हो, इंतज़ार रहेगा ...

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  6. आपका स्नेह, आपकी सोच......नीमा जी के मुस्कुराने के लिए और क्या चाहिए !

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  7. Aap to sach me bade prashansak hain apni patni k...naam k gaan me hi kavita ho gayi... intzaar hai aage ki baaton ka...

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  8. aadarniya sir,
    sabse pahale aapko aapki shadi ki rajat jayanti par hardik badhai.mujhe to aapki shrimati ji ka neema naam hi bahut pyara laga.sundar rachna ke liye badhai.
    poonam

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  9. aapko aur Nimmo bhabhi ko badhaiyan !

    Belated happy marriage anniversary.

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  10. रजत जयंती कीबधाई ...
    आपकी कविता से लग रा है रोमांस जारी है ... जारी रहना चाहिए ....

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  11. बहुत रोचक रच्ना है अब आगे पढने की उत्सुकता जाग गयी है। आभार

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  12. नीमा जी को देख मन खुश होगया ।पिछली बार जब मैं उनसे मिली,लगा कि बुलन्द ठहाके ,जो उनकी एक विशेषता है , कहीं खोगए हैं ।वो मेरी अच्छी मित्र हैं ।कुछ दिनों पहले उन्होंने कहा ,गिरिजा जी आप मेरे लिये भी कुछ लिखिये ।मैंने लिखा भी पर भेज न सकी ।यहाँ उत्साही जी की कविता ,जो उनके जीवन का सच्चा दस्तावेज है ,पढ कर मुझे उस कविता के कुछ अंश यहाँ देने का खयाल आया । विवाह की रजत जयन्ती पर शुभ-कामनाओं के रूप में मैं इसे दोनों को (नीमा-राजेश)भेंट कर रही हूँ----
    पर्वतों से निकली हो।
    बूँद-बूँद पिघली हो ।
    पत्थरों को तोडती,
    निर्मल जलधार हो ।
    नीमा या निर्मला तुम ,निश्छल उद्गार हो ।
    हाथों में कठोरता के , कोमल उपहार हो ।
    चीर दे उदासी को, फाडदे अँधेरे को ,
    ऐसी उन्मुक्त हँसी ,तुम तो साकार हो ।

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  13. राजेश जी ,

    नाम पर इतनी अच्छी कविता पहली बार देखी .....!

    लाजवाब कर दिया .....!!

    नीमा बहुत ही प्यारा संबोधन है ....!1

    यूँ पत्नी के लिखी ये रचना आपका पत्नी प्रेम भी दिखलाती है ...!!

    हमें तो रश्क होने लगा ......!!

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  14. हमरी सम्वेदना के स्वर पर त आप हो आए...कभी हमरे अंगना भी तसरीफ लाइए...

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  15. राजेश जी,
    कविता के अंग अंग से प्रेम फ़ूट फ़ूट कर झलक रहा है……………आपके इतने गहरे अहसास उतर आये हैं कि उनके लिये शब्द भी कम पड जायें……………अगर उस दिन आप अपनी पत्नी को इतनी ही पढ्वा देते तो ये उनके लिये अनमोल तोहफ़ा होता………………अब तो आगे की कविता का इंतज़ार है।

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  16. उत्साही जी
    बेहद सरल सुदंर रचना। जिस मर्जी नाम से आप पुकारें ये आपका अधिकार है हम तो क्या कहें भाभीजी ही कहेंगे।

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  17. दादा प्रणाम
    साखी पर मेरी ग़ज़लों को आपने जो प्यार दिया उससे मैं बहुत अभिभूत हूं आभार प्रकट करने की हिम्मत तो नहीं है. आपके दोनों सुझाव बहुत अच्छे थे और आगे के लिए मार्गदर्शन भी.
    आपकी कविताएं पढ़ी. प्रेम के कुछ क्षण में ‘मैं भूल जाना चाहता हूं बोकर प्रेम के कुछ क्षण यहां वहां‘ अद्भुत है इस पर बहुत कुछ न्यौछावर.

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  18. @शुक्रिया संजीव भाई,
    यकीन है कि आपने दादा शब्‍द का उपयोग बड़े भाई के स्‍थान पर किया है। क्‍योंकि अभी न तो दादा कहलवाने की उम्र हुई है और न ही अनुभव ।
    और संजीव भाई आभार प्रकट करने की नहीं मानने की चीज है। आपने माना आपका बड़प्‍पन है। क्‍योंकि सुझाव तो पेड़ की झुकी हुई डाली पर लगे हुए फूल हैं। आपको अच्‍छे लगें तो अपनी शोभा बनाएं, अन्‍यथा उनका क्‍या है।
    बहरहाल आपको कविता ने छुआ,इसी मैं मेरे लिखने की सार्थकता है।

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  19. wah sir..badi hi nirmal si panktiyaan kahi hai..jeevan ka gulmohar barbas hi mahak utha hai kavita mein..:)

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  20. बाबा भारती जी,
    मेरा उद्देश्य कतई डराने का नहीं था उन तस्वीरों से.. एक प्रयोग किया था हमने, जिस्के अंतर्गत त्रिवेणी की विधा में कुछ लिखने का प्रयास किया था… और चेष्टा थी कि चित्रों को हम ऐसा बनाएँ (फोटो शॉप की मदद से) कि तस्वीरें स्वयम् कविता की अभिव्यक्ति लगें... आपका सुझाव सर माथे... आना बंद न करें...हमारी सम्वेदनाओं के द्वार आपकी प्रतीक्षा करेंगे!!
    खड़गसिंह

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  21. इस रचना से आपका प्यारा दिल और अपनी जीवन संगिनी के प्रति अटूट लगाव झलकता है राजेश भाई ! आप जैसे जीवनसाथी पाने के लिए नीमा जी को बधाई !

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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