सोमवार, 28 जून 2010

याद : दो नए बिम्‍ब

(एक)
याद की
हिचकियां
आजकल गले में नहीं
मोबाइल फोन में आती हैं
एसएमएस के बहाने ।

(दो)
याद 
आजकल
धड़कन से महसूस नहीं होती
देर रात गए
उंगलियां यूं ही मोबाइल पर
चली जाती हैं
और याद
मिस काल बन जाती है।
** राजेश उत्‍साही

23 टिप्‍पणियां:

  1. waqt ki baat hai, kabhi ye yaad postcard me ubharti thi, ab sms me.......:)

    Sir!! aapke kavita ke liye main kya kahun......:)

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  2. क्या बात है..आज का यही यथार्थ है.

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  3. aaj to yaad aise hii aati jati hai .......ye bhi ek andaaz hai.

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  4. मोबाईल ने छीन ली सारी बेचैनी....!

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  5. राजेश जी, बिल्कुल सही आज के परिवेश में याद कुछ इसी तरह से व्यक्त किए जाते है..खूब दर्शाया आपने सुंदर क्षणिकाएँ...बधाई

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  6. $ ye mere blog pe comment ke sandharbh me hai..

    राजेश भैया आपकी बात मुझे अच्छे से याद है, लेकिन उसके लिए दिमाग भी तो होना चाहिए....कोशिश कर रह हूँ, आपके संसर्ग में रह कर, जल्दी ही अपने को बेहतर बना पाउँगा.....आपके आशीष की जरुरत बराबर पड़ेगी.............:)

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  7. @मुकेश भाई, अपने दिमाग की तौहीन मत करो, उसे इस्‍तेमाल करो।मेरी जितनी समझ है उसके आधार पर कहना चाहता हूं कि आप में कविता कहने और लिखने का कौशल है। जरूरत केवल इस बात की है कि आप थोड़े धीरज से काम लें। हो सकता है और लोगों ने भी आपको यह टीप दी होगी या आपको पता होगा। जब भी कुछ लिखें,उसे एक पाठक के नजरिए से पढ़ें। देखें कि उसमें क्‍या ऐसा है जिसकी जरूरत नहीं है। या क्‍या ऐसा है जिसका कोई और बेहतर विकल्‍प हो सकता है। कुछ शब्‍दों को लेकर हो सकता है आपका मोह हो। उनसे मोह छुड़ाने की कोशिश करिए। और मुकेश भाई देखिए आशीष का तो आपके ब्‍लाग पर टिप्‍पणियों के रूप में ढेर लगा है। आपको आशीष से ज्‍यादा अभ्‍यास की जरूरत है। वह आप करिए। आशीष देने वाले लाइन लगाकर खड़े होंगे। शुभकामनाएं।

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  8. समसामयिक यादों के प्रतिविम्ब

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  9. कम शब्दों में, गहरी बात....प्रशंसनीय बिम्ब उपस्थित किये हैं....

    सादर!

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  10. पहली बार आना हुआ यहाँ..यत्र तत्र सर्वत्र आपकी बेबाक टिप्पणियों ने मोह लिया और मुझ जैसे खडगसिंह को यही चाह बाबा भारती के दर पर ले आई. हमारा नमस्कार स्वीकार करें... आपकी कविता मन को भा गई, आज का यथार्थ यही है कि मानव पाँच कानों वाला, दो प्रकृति प्रदत्त, दो श्रवण यंत्र (ईयर फोन) और एक मोबाईल का स्पीकर ( ईयर फोन और मोबाईल के स्पीकर म्युचुअल्ली एक्सक्लूसिव हो सकते हैं) एक दानव बना दिया है. ऐसे दानव की हिचकियाँ और धड़कनें वैसी ही होंगी जैसा आपने वर्णन किया है... सत्यपरक.

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  11. जानदार बात कही है आपने। अब तो यदि मोबाइल कुछ देर नही बजता तो लगता है कोई हमें याद ही नहीं करता। औऱ मिस काल के चक्कर में कई बार बैंक में फोन लग जाता है. बाकी आप तो काफी सीनियर हैं क्या कहं.

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  12. wakai, badal raha hai yaadon ka swaroop.
    prabhavi ab bhi hain magar...
    khubsurat kavitaayein

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  13. बहुत सुन्दर कविता . ...
    _________________
    "पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

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  14. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, याद को कोई न कोई जरिया तो चाहिए ही, फिर चाहे वो एसएमएस हो या हिचकी ।

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  15. मेरे ब्‍लाग सदा सृजन पर आपके आने का बहुत-बहुत आभार ।

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  16. यादें और खास तौर पर सुनहरी यादें उन ठंडी हवाओं की तरह हैं जो आपको ताजगी दे जाती हैं।
    दीपाली

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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