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सोमवार, 7 दिसंबर 2015
बुधवार, 2 नवंबर 2011
प्रेम : नर्मदा किनारे
।।एक।।
मेरे तुम्हारे
बीच का फासला
जैसे सात समन्दर पार की दूरी
सात समन्दर पार जाना
शायद
अब भी हमारी
संस्कृति के खिलाफ है।
।।दो।।
चुप-चुप सी
ऊपर से
अंदर-अंदर ही आंदोलित
नर्मदा
और दूर रेत पर
जलती आग
जैसे मेरा दिल हो।
।।तीन।।
उतर आया है
पूरनमासी का चांद
प्रतिबिम्ब में नजर
आ रहा है तुम्हारा चेहरा
ठीक वहीं,
जहां काला दाग है चांद में।0 राजेश उत्साही
शुक्रवार, 11 जून 2010
प्रेम के कुछ क्षण
एक गिलहरी
अपने भोजन के बहाने
छुपाकर भूल जाती है तमाम बीज मिट्टी में
ताकि कड़े दिनों में आएं काम
मैं भूल
जाना चाहता हूं बोकर
प्रेम के कुछ क्षण
यहां-वहां
ताकि
उदास होने लगूं
जब इस नश्वर दुनिया से
तब
जी सकूं
उनके लिए।
0 राजेश उत्साही
(जून,2010 बंगलौर)
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