| राजेश उत्साही |
दिया मिट्टी का जले
या तन का
रोशनी दोनों से होती है
दोनों ही तो मिट्टी हैं
तेल में भीगकर
जलती है बाती
सुलगकर वह अंधेरे में
राग उजाले का है गाती
मन की कंदील में
खुशियों का तेल गलता है
रोशनी का झरना
आंखों से निकलता है
दिये की रोशनी
राह जग की दिखाती है
मन की आभा
इसे और जगमगाती है
सरलता से, सहजता से
जो यह जान लेते हैं
समय होता है जो सामने
वही सर्वोत्तम है मान लेते हैं
कहने की नहीं जरूरत
हो सबको मुबारक दिवाली
पकवान जो चाहे बनाएं
या पकाएं पुलाव ख्याली
शुभ हो और केवल शुभ हो
आपको यह दिवाली।
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