बुधवार, 28 दिसंबर 2011
रविवार, 18 दिसंबर 2011
स्वेटर बनाम सपना
| फोटो : राजेश उत्साही |
बेकार नहीं है चाहे
स्वेटर हो
या सपना
दोनों
जरूरत से उपजते हैं
बुने गए हों अगर
दिल और दिमाग से
तो बहुत काम आते हैं
जिंदगी भर
स्वेटर
सर्द वक्त के
लिए रखता है ऊष्मा
अपने में संजोकर
स्वेटर
किसी की
गर्म सांसों का अहसास-सा है
स्वेटर
रहता है
सालों साल साथ हमारे
अतीत की न जाने
कितनी यादों के एलबम की
तरह
होना
स्वेटर का
एक तसल्ली देता है
हरदम हमें
सपना या सपने
जब तक नहीं होते
साकार
रहते हैं साथ हमारे
भविष्य की घटनाओं की तरह
स्वेटर
की तरह सपनों की ऊष्मा
कम होती रहती है
धीरे-धीरे
स्वेटर
की तरह
सहेजते रहना
सपनों को
बनाता है जिंदगी को
कहीं अधिक आस्थावान
ऊष्मावान
इसलिए
बुनना
बेकार नहीं है
चाहे स्वेटर हो
या फिर सपना।
0 राजेश उत्साही
मंगलवार, 6 दिसंबर 2011
अदिति से
एकलव्य में कार्यरत दीपाली शुक्ला ने हाल ही में कैमरा खरीदा है। और वे पिछले कुछ दिनों से फोटोग्राफी में हाथ आजमा रही हैं। वे कविताएं और कहानियां लिखती रहीं हैं। मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हो रहा है कि उनकी उतारी तस्वीरें भी किसी कविता से कम नहीं हैं। पिछले दिनों भोपाल के मानव संग्रहालय का भ्रमण करते हुए उन्होंने कुछ तस्वीरें उतारीं। इन्हें उन्होंने फेसबुक पर सबके साथ साझा किया है। इनमें से दो तस्वीरों ने मुझे बेहद रोमांचित किया है। पहली तस्वीर पर आधारित आत्मविश्वास कविता आप पढ़ चुके हैं। यह रही दूसरी तस्वीर और उस पर आधारित कविता। पहली कविता प्रकाशित होने पर अदिति ने अपनी टिप्पणी में लिखा कि तस्वीर की दो लड़कियों में से एक वह है। इस तस्वीर में केवल अदिति ही है। एक बार फिर शुक्रिया, दीपाली और अदिति ।
क्लांत नहीं हो तुम
नहीं हो तुम उदास
इंतजार नहीं है तुम्हें
उसका जिसे देखा नहीं है तुमने
सोचा नहीं है जिसके बारे में अब तक
मुझे पता है
तुम्हारे माथे पर
कोई सलवटें नहीं हैं
नहीं है तुम्हारी आंखों में खामोशी
झलक नहीं रहा है तुम्हारे चेहरे से तनाव
मुझे पता है
तुम्हारे कोमल पैरों के तलुए
अभी अछूते हैं छालों से
तुम्हारी ऐडि़यां परिचित नहीं है बिवाईयों से
मुझे पता है
मुझे तुमसे
बहुत उम्मीदें हैं
उम्मीदें इसलिए कि
तुम अंधेरी कोठरी से निकलकर
इस धवल लिबास में
पवित्रता की प्रतिनिधि लग रही हो
लग रही हो जैसे कोई हंसनी
आ बैठी हो पंख फैलाए
तुम्हारी दूधिया आंखों से
सुनहरे सपनों का उजास उमड़ा आ रहा है
मुझे तुमसे
बहुत उम्मीदें हैं
उम्मीदें इसलिए कि
कलाई में सजी
घड़ी परिचायक है
कि तुम समय की नब्ज पहचानना सीख रही हो
कलाई में बंधा और गले में पड़ा रंगीन धागा बता रहा है
कि अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों में आस्था है तुम्हारी
यूं गोबर लिपे फर्श पर आत्मीयता से बैठना
बताता है कि तुम जुड़ी हो जमीन से
मुझे तुमसे
बहुत उम्मीदें हैं
उम्मीदें हैं इसीलिए मैं बस इतना ही कहूंगा
समय के साथ चलना,
आस्था रखना, पर मत बनने देना उसे पैरों की बेड़ी
जमीन पर रहना , पर आकाश को मत करना अनदेखा
चाहे तुम समझना इसे
हिदायत, सलाह या कि चेतावनी मेरी
दुनिया को आसान समझना
पर उतनी नहीं, जितनी नजर आती है वह।
0 राजेश उत्साही
0 राजेश उत्साही
(6 दिसम्बर,2011)
*******
एक अनुरोध : मेरी पिछली कविता 200 से अधिक लोगों ने पढ़ी। लेकिन प्रतिक्रिया केवल 25 से कुछ अधिक लोगों ने व्यक्त की।कुछ पाठक टिप्पणी बाक्स में प्रतिक्रिया करने से कतराते हैं या उन्हें मुश्किल लगता है। ऐसे सुधी पाठक अपनी प्रतिक्रिया ईमेल से भी भेज सकते हैं। मेरा ईमेल है utsahi@gmail.com । पाठकों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है।
सोमवार, 28 नवंबर 2011
आत्मविश्वास
एकलव्य में कार्यरत दीपाली शुक्ला ने हाल ही में कैमरा खरीदा है। और वे
पिछले कुछ दिनों से फोटोग्राफी में हाथ आजमा रही हैं। वे कविताएं और कहानियां लिखती
रहीं हैं। मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हो रहा है कि उनकी उतारी तस्वीरें भी किसी
कविता से कम नहीं हैं। पिछले दिनों भोपाल के मानव संग्रहालय का भ्रमण
करते हुए उन्होंने कुछ तस्वीरें उतारीं। इन्हें उन्होंने फेसबुक पर सबके साथ
साझा किया है। इनमें से दो तस्वीरों ने मुझे बेहद रोमांचित किया है। पहली आप ऊपर
देख रहे हैं। इस तस्वीर को देखते हुए मेरे अंदर की कविता कुछ इस तरह बाहर आई।
शुक्रिया दीपाली।
अब तक हमने
मिट्टी और गोबर से लिपी खिड़कियों से
झांककर बाहर
का खुला आसमान देखा था
देखा था अंधेरी कोठरियों की नन्हीं दरारों से
सूरज को उगते हुए
पर अभी अभी जाना है हमने कि
कितना अनोखा है
खुले आसमान के नीचे
खड़े होकर
देखना अपने अंतस को
हमारे होठों पर
यह मुस्कराहट
उस आजादी की है
जो हमने पाई है अपने आपसे लड़कर
हमारी
इस आंकी बांकी नजर को
मत समझ लेना मासूमियत की अदा
बेशक लावण्य हममें कूट कूटकर भरा है
पर सहेजने के लिए उसे
हद दर्जे तक टूटना होता है अपने में
हर वर्जना से, हर दंभ से
और इस भ्रम में मत रहना कि
दमकता हुआ हमारा मुख
सूरज के प्रकाश से आलोकित है
चेहरे पर यह आभा
उस आत्मविश्वास की है
जिसे खोजा है हमने
अपने अंदर गहरे उतरकर ।
0 राजेश उत्साही
(29 नवम्बर,2011,बंगलौर)
बुधवार, 23 नवंबर 2011
सब कुछ ठीक है...!
अच्छा खासा है हीमोग्लोबिन
इससे पर्याप्त मात्रा में मिलेगी ऑक्सीजन आपको
कोलेस्ट्राल नियंत्रण में है
और ब्लडप्रेशर भी
बस शुगर हो गई है 148
मेडीकल रिपोर्ट देखते हुए
मुझसे आधी उम्र के डॉक्टर ने कहा
पूछा नहीं उसने
बस दे दीं हिदायतें
नो स्मोकिंग
नो अल्कोहल
तिरेपन के हो गए हैं आप
जॉंगिंग मत करिए, हां पैदल जरूर चलिए
कम से कम चार किलोमीटर रोज
और हां मीठे से कर लीजिए तौबा
पर डायटिंग मना है आपके लिए
*
ऑक्सीजन....मिलेगी तब, जब होगी
अभी तो हम जिंदा हैं जहरीली होती हवा पर
बीड़ी, सिगरेट और धुंए वाली किसी चीज का नशा
किया नहीं अभी तक हमने
पर डॉक्टर
उस ‘स्मोक’ का क्या करें जो न चाहते हुए भी
उस ‘स्मोक’ का क्या करें जो न चाहते हुए भी
जब तब चला आता है फेंफड़ों में
और...अल्कोहल तो केवल
बोतलों में नहीं मिलता डॉक्टर
आंखों में भी होता है और रूप में भी
उससे कैसे बच सकते हैं अपन
रही मीठे से तौबा की बात
तो कड़वे से अपना जन्म जन्म का नाता है
इसीलिए मीठा खाकर मीठा बोलने की जुगत में रहते आए हैं
अब उस पर भी प्रतिबंध !
डायटिंग ! यह किस चिडि़या का नाम है ?
हां भूखे रह जाने को आप डायटिंग कहते हैं
तो कह सकते हैं
पूरा जीवन ही यहां
जॉगिंग करते यानी भागते-दौड़ते बीता है
आप कहते हैं पैदल चला कीजिए
यह कैसे संभव है ?
कुछ भी तो ठीक नहीं है
डॉक्टर
पर आप कहते हैं
तो मान लेता हूं कि
सब कुछ तो ठीक है।
0 राजेश उत्साही
(16 नवम्बर,2011, बंगलौर)
शनिवार, 12 नवंबर 2011
जन्मदिन बंगलौर में
अब से
तीन बरस पहले तक
हर जन्मदिन पर
मां करती थीं माथे पर तिलक
उतारती थीं आरती
और बनाती थीं आटे में गुड़
घोलकर
गुलगुले
मां
वहीं हैं
मैं ही चला आया हूं
दूर उनसे
अब से
तीन बरस पहले तक
जन्मदिन पर
कभी बाबूजी स्वयं और
कभी-कभी उनका आर्शीवाद आता
था
टेलीफोन की घंटी के साथ
'खुश रहो'
बाबूजी
अब नहीं हैं
मैं भी तो चला आया था
दूर उनसे
अब से
तीन बरस पहले तक
पिछले 23 बरसों से
पहली शुभकामना नीमा ही देती
थीं
नीमा वहीं हैं
मैं भी वहीं हूं
भले ही चला आया हूं दूर
उनसे
अब से
तीन बरस पहले तक
सुबह-सुबह गोलू-मोलू
आंख मलते-मलते
'हैप्पी बर्थडे पापा' कहते
हुए लजाते थे
वे अब भेजते हैं
एसएमएस
क्योंकि नहीं हूं मैं पास
उनके
चला आया हूं दूर
अब से तीन बरस पहले तक।
0 राजेश उत्साही
बुधवार, 2 नवंबर 2011
प्रेम : नर्मदा किनारे
।।एक।।
मेरे तुम्हारे
बीच का फासला
जैसे सात समन्दर पार की दूरी
सात समन्दर पार जाना
शायद
अब भी हमारी
संस्कृति के खिलाफ है।
।।दो।।
चुप-चुप सी
ऊपर से
अंदर-अंदर ही आंदोलित
नर्मदा
और दूर रेत पर
जलती आग
जैसे मेरा दिल हो।
।।तीन।।
उतर आया है
पूरनमासी का चांद
प्रतिबिम्ब में नजर
आ रहा है तुम्हारा चेहरा
ठीक वहीं,
जहां काला दाग है चांद में।0 राजेश उत्साही
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