सोमवार, 10 जून 2013

हमारे होने में



हमारे होने में 
किन लोगों का हाथ है 
और किनके होने में हमारा
यह 
या तो हम खुद जानते हैं 
या फिर खुदा
बशर्ते कि वह कहीं हो !
o राजेश उत्‍साही


शनिवार, 6 अप्रैल 2013

एंटालिका*



रोज इस जंगल से गुजरता हूं
जंगल में मेरी चीख गूंजती है पेड़-पेड़ तक
पेड़ उसे अपनी ही चीत्‍कार समझते हैं
और चुप रहते हैं देर देर तक
रोज इस जंगल से गुजरता हूं

रोज गुजरता हूं दरकती जमीन से
जमीन के सीने पर गिरते मेरे कमजोर कदम
बताते हैं उसे मेरी प्‍यास के बारे में
मिट्टी उसे अपनी ही प्‍यास समझती है
और,
थोड़ा और तड़क जाती है अपने में
रोज गुजरता हूं दरकती हुई जमीन से

रोज गुजरता हूं एंटालिकाओं के बीच से
एंटालिकाओं की दीवार से टकराती है मेरी हाय
वे उसे अपने में सींचे गए खून की हाय समझती हैं
और,
और थोड़ी ऊंची हो जाती हैं सतह से
रोज गुजरता हूं एंटालिकाओं के बीच से
                                                                                                                                     
एक दिन गुजर ही जाऊंगा
लेकिन त‍ब भी ,
यह जंगल, जमीन और एंटालिका
आएंगे मेरे मृत सपनों में ।
0 राजेश उत्‍साही
(एंटालिका मेरा बनाया हुआ प्रतीक शब्‍द है। मुम्‍बई में मुकेश अंबानी के घर का नाम एंटीलिया है। कहा जाता है कि यह हिन्‍दुस्‍तान का सबसे महंगा घर है। इसकी लागत दस हजार करोड़ रुपए से भी अधिक बताई जाती है।)

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

अनुभव


                                                                             राजेश उत्‍साही
अतीत के कूप से
जरूरत के लोटे से 
अनुभवों का जल खींचता हूं
कार्यों की फसल बोने से पहले
वर्तमान को सींचता हूं।
0 राजेश उत्‍साही

मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली के सब रंग मुबारक



मारेंगे गोली,  देंगे दो ताली
जनता तो है भोली  भाली
भाड़ में जाए, गिरे कुएं में
   या करती रहे खामख्‍याली   

इसमें तो है हमें महारत 
होली के सब रंग मुबारक

बहाएं पानी,  लुढ़काएं पानी
आज कहें पर बात सयानी
सूखे रंगों से सब खेलें होली
और करें जी भरकर नादानी

हम ठहरे समाज सुधारक
होली के सब रंग मुबारक

इसको तकेंगे, उसको लखेंगे
गाली  का भी स्‍वाद चखेंगे
बिल लाओ संसद में कितने
हम तो कभी नहीं  सुधरेंगे

क्‍यों बिताएं जीवन अकारथ
होली के सब रंग  मुबारक
 
रंग की होली, भंग की होली
अमीर, गरीब, मध्‍यम होली
   आओ खेलें  सब मिलजुल   
  अपने तुपने सब हमजोली  

कुछ तो हों दुख  नदारद
होली के सब रंग मुबारक

      0 राजे त्‍साही

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

पानी



                                                                             राजेश उत्‍साही

पानी
अब कहां है

पानी जो हम पीते थे
पानी जो हम जीते थे
पानी  
मीठा पानी
पानी का मीठापन
अब नहीं है

न पानी रहा
न पानीदार लोग
पानी न आंखों में है
न चेहरे पर

पानी उतर गया है
जमीन में बहुत नीचे
इतना, जितना कि आदमी अपनी
अपनी आदमियत से।
0 राजेश उत्‍साही

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