रविवार, 18 सितंबर 2011

सफर में


                                                                            फोटो : राजेश उत्‍साही 
जाते हुए
रोज के सफर पर, अक्‍सर
हम ढूंढते हैं ऐसी जगह
जहां बैठी हो कोई सुंदर स्‍त्री

किसी भी तरह
प्रयत्‍न करते हैं
उसके सामने बैठने
या खड़े होने का
ताकि निहार पाएं उसे
सेंक पाएं अपनी आंखें

थोड़ी ही देर में
शुरू होता है मानसिक मैथुन
रेंगना शुरू कर देते हैं
उसकी देह पर

खो जाते हैं
एक कल्‍पनातीत संसर्ग में
काटकर उसे
उसकी दुनिया से ले आना
चाहते हैं अपने साथ

संभव है
वह मां हो दो प्‍यारे-प्‍यारे
बच्‍चों की
हमसे कहीं अधिक
सुंदर मनोहर जीवन साथी हो
उसका
करता हो उसे स्‍नेह बेशुमार
तमाम परिजनों से भरा-पूरा
परिवार हो उसका

या कि यातना
भोग रही हो अपने जीवन में
रोज तिल-तिल मरकर

हमें
इससे क्‍या
हम तो भोगना चाहते हैं
उसे पल दो पल
बनाना चाहते हैं
सपनों की साम्राज्ञी
न्‍यौछावर करना चाहते हैं
अपना जीवन
या कि हवस?
0 राजेश उत्‍साही

सोमवार, 4 जुलाई 2011

तीन : इतनी जल्‍दी नहीं मरूंगा मैं !


तय है 
मरूंगा एक दिन
पर इतनी जल्‍दी नहीं
तसल्‍ली रखें !

बच
गया था
मौत के आगोश में जाने से
सन् उन्‍नीस सौ सत्‍तर में
सीख रहा था जब
चलाना सायकिल

मई की
एक तपती दोपहरी में
सबलगढ़ की बीटीआई जाने वाली 
सुनसान सड़क पर
मेरे अलावा
केवल लू चल रही थी

सायकिल
पर सवार मैं
कभी दायां,कभी बायां पांव
पैडल तक पहुंचाने की कोशिश में
जूझ रहा था

डगमगाती
सायकिल बढ़ रही थी
पिघलते कोलतार की सड़क पर

तभी
लगभग मुझे
धकाती परे सड़क से
गुजर गई थी बस एक
आंधी की तरह मेरी बगल से

अचकचाकर
गिरा था सा‍यकिल सहित
चारों खाने चित्‍त मैं
पिछला पहिया
गुजरा था मुझसे
बस का
बस इंच भर की दूरी से

रूकी थी बस
उतरकर आया था कंडक्‍टर
खाईं थीं उससे
कुछ भद्दी गालियां और दो थप्‍पड़
बेवजह

पर
सलामत थे
मैं और मेरी सायकिल
तो तसल्‍ली रखें
इतनी जल्‍दी (?)
नहीं मरूंगा मैं !!

0 राजेश उत्‍साही

शनिवार, 11 जून 2011

दो : इतनी जल्‍दी नहीं मरूंगा

मरूंगा
मैं एक दिन
पर इतनी जल्‍दी नहीं
तसल्‍ली रखें

रह आया
मैं जिन्‍दा जब
पढ़ता था पांचवीं
सबलगढ़ जिला मुरैना में

अक्‍टूबर ,1969
की एक दोपहरी में
बारिश भर
बिस्‍तर पेटी में कैद रहे अलसाए
कपड़ों को भा रही थी धूप
वे फैले थे आंगन में

पिताजी काम पर गए थे
मां बीस गज की दूरी पर
नल से गिरते
कल कल करते जल 
के नीचे धो रही थीं
कपड़े

घर सुनसान था
केवल एक गौरेया 
यहां से वहां फुदक रही थी
खाली थी बिस्‍तर पेटी
टीन की बनी पेटी
हमेशा उकसाती रही थी मुझे
अपने अन्‍दर सोने के लिए

पाकर मौका यह
जा लेटा था मैं उसमें
करवट अदल बदलकर
अहसास भर रहा था अपने में
बिस्‍तर होने का
तभी
भरभराकर गिरा था
पेटी का ढक्‍कन
सांकल ने थाम लिया था कुन्‍दों को
कैद हो गए थे
मैं और मेरे अहसास
बिस्‍तर पेटी में

घबराकर
हाथ-पांव मारे थे
घुटने लगा था दम
आवाज अटक गई थी हलक में
बन्‍द होने लगी थीं आंखें
शरीर होने लगा था निढाल
समेटकर ताकत सारी
चिल्‍लाया था मैं जोर से
अम्‍मां 
बस एक बार

डोर
टूट रही थी जीवन की
कोस रहा था उस मनहूस घड़ी को
जब सोचा था करने को यह प्रयोग

तभी खुला था जैसे आसमान 
सामने अम्‍मां खड़ी थीं
लथपथ गीले कपड़ों में

वे अनंत से आती
मेरी चीख सुनकर दौड़ी चलीं आईं थीं
बीस गज दूर से 
वे गईं थीं सप्‍पने में
जहां रखा होता था पानी का ड्रम
कहीं मैं उसमें तो नहीं
डूब गया
और फिर अचानक ही उनकी निगाह
पड़ी थी बंद बिस्‍तर पेटी पर 

जिसमें
मैं लेटा था
पसीने से तरबतर
लिए लाल से पीला होता चेहरा

तो बचा था
एक बार फिर
होते-होते मुर्दा
तसल्‍ली रखें
इतनी जल्‍दी (?)
नहीं मरूंगा मैं ।

0 राजेश उत्‍साही

रविवार, 22 मई 2011

इतनी जल्‍दी नहीं मरूंगा मैं : एक


पढ़कर
मरने की मेरी ख्‍वाहिश
परेशान हैं सब
तसल्‍ली रखें
इतनी जल्‍दी नहीं मरूंगा मैं

रहा था मैं
जिन्‍दा
तब भी, जब था कुल जमा
इक्‍कीस‍ दिन का
अपने मां-बाप की तीसरी संतान
पहली दो इतने दिन भी पूरी नहीं कर पाई थीं
इस नश्‍वर संसार में

बकौल नानी
जो अब नहीं हैं 
कहने को वे 1995 तक तो थीं
उन्‍हें गुजरे भी जमाना गुजर गया
दिसम्‍बर 1958 की एक सर्द रात को
मां के सीने से चिपका निद्रालीन था
पत्‍थर से बने घुड़सालनुमा रेल्‍वे क्‍वार्टर में
पिता पास ही बने स्‍टेशन में
बतौर स्‍टेशन मास्‍टर रात बारह से आठ की ड्यूटी बजा रहे थे

क्‍वार्टर अब भी हैं
मिसरोद या मिसरोड रेल्‍वे स्‍टेशन के किनारे
भोपाल से जाते हुए इटारसी की तरफ पहला स्‍टेशन
जब भी गुजरता हूं यहां से
बदन में सुरसुरी सी दौड़ जाती है क्‍वार्टर देखकर

तो क्‍वार्टर में थी
निझाती हुई अंगीठी,
जिसके कोयलों में जान बाकी थी
कोयले किसी पैसेंजर गाड़ी के भाप इंजन ड्रायवर से
सर्दी और छोटे बच्‍चे का वास्‍ता देकर हासिल किए गए थे

कोयले बदल रहे थे क्‍वार्टर को
कार्बनडायआक्‍साइड या 
ऐसी ही किसी दमघौंटू गैस के चैम्‍बर में

न जाने किस क्षण
घुटन महसूस की मां ने
और उठाकर मुझे बदहवास भागीं बाहर की ओर
गिरीं चक्‍कर खाकर आंगन में धड़ाम से
चीखकर रोया था मैं
और घबराकर मां

रात के सन्‍नाटे में सुनकर हमारा विलाप
पिता जी भागे चले आए थे  
और तभी कोई गाड़ी धडधड़ाती हुई गुजर गई थी
स्‍टेशन पर बिना रुके

मैं 
सुरक्षित था
तो तसल्‍ली रखें
इतनी जल्‍दी (?)
नहीं मरूंगा मैं ।

0 राजेश उत्‍साही

शनिवार, 7 मई 2011

मैंने सोचा

गुजरते हुए
शाहपुरा झील के किनारे से
मैंने सोचा
खड़ा कर दूं स्कूटर एक तर
और उतर जाऊं
झील के अन्दर
कपड़े पहने-पहने ही

आसपास कोई नहीं है
हां सड़क पर आवागमन जारी है
सब अपनी धुन में हैं
किसे फुरसत है इधर-उधर देखने की

सोचा कैसे होगी
मेरी शिनाख्त
प्लास्टिक मढ़ा या कि चढ़ा
कोई आइडिंयेटी कार्ड नहीं है जेब में
हां लायसेंस जरूर है
पर वह तो पानी में गल चुका होगा
उस पर लिखे अक्षर घुल चुके होंगे

पेंट की पिछली जेब में
रखी डायरी
भी हो चुकी होगी तार-तार
और शायद उसके पन्ने भी
पानी की सतह पर उतरायेंगे
मेरी ही तरह
कुछ समय बाद

झील के किनारे
खड़ा रहेगा
बदरंग स्कूटर कुछ समय यूं ही
फिर खटकने लगेगा
लावारिस की तरह हर 
आने-जाने वाले की आंख में

फिर कोई राह चलता
भला मानुष
इत्तला कर देगा
थाने में फोन पर

आएगी पुलिस
पूछताछ करेगी
आसपास
फिर तोड़ेगी डिक्की
उसमें से निकलेंगे कागज
गाड़ी के
जिनमें होगा नाम पता मेरा
तब तक धंस चुका होऊंगा मैं
झील की गहराई में

गुजरते हुए
शाहपुरा झील के किनारे से
मैंने सोचा!
(ये सोच भी अजीब शह है। हम जब सोचना शुरू करते हैं तो क्‍या-क्‍या सोच लेते हैं। यह कुछ बरस पहले की अभिव्‍यक्ति है। शाहपुरा झील भोपाल में है। जब यह कविता दोस्‍तों को पढ़वाई तो कुछ अजीब सी प्रतिक्रिया हुई। जवाब में तीन-चार कविताएं और निकल आईं। वे बाद में।) 
                                        0 राजेश उत्‍साही

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

नूर मोहम्‍मद और उसका घोड़ा


नूर मोहम्‍मद
वल्‍द जहूर मोहम्‍मद
रहना बालागंज
तांगेवाला

चलाते हुए तांगा
दौड़ाते हुए तेज तांगा
फटकारते हुए चाबुक घोड़े पर
सोचता है
खूब ढोएगा सवारी
मिलेंगे खूब पैसे
सोचता है
खरीदेगा तांगे
एक,दो,तीन....बहुत सारे
चलाएगा
किराए पर सेठ की तरह

बनवाएगा
शकील की निकर,
सलमा की सलवार
और...और बेगम के लिए दुपट्टा
बनवाएगा
मकान,पक्‍का आलीशान
सोचता है..

यक ब यक
रुक जाता है घोड़ा
घोड़े को मालूम है
क्‍या सोचता है उसका मालिक

पर इस पूरे सोच में
उसका जिक्र क्‍यों नहीं है
क्‍यों नहीं है
सोच
उसके बारे में, उसकी सेहत के बारे में
उसकी खुराक के बारे में
उसके पूरे वजूद के बारे में

जबकि
नूर मोहम्‍मद का पूरा सोच
उस पर टिका है
टिका है उसका तांगा
मुझ घोड़े पर

नूर
जानता है
क्‍या सोचता है घोड़ा ऐसे में
तभी तो वह कह देता है
चल,चल यार चल
तेरी भी फिकर है मुझे

चल देता है घोड़ा
सोचकर कि
नूर सोचेगा
उसकी सेहत के बारे में
उसकी खुराक के बारे में
उसके पूरे वजूद के बारे में

पर नूर
नूर सोचता है
सिर्फ अपने बारे में
शकील,सलमा और बेगम के बारे में
मकान,आलीशान मकान के बारे में
         0 राजेश उत्‍साही

शनिवार, 19 मार्च 2011

मासूम चिडि़या

                                                                      फोटो : राजेश उत्‍साही 

वह
एक मासूम चिडि़या
मेरी तस्‍वीर पर
अपना घोंसला
बनाना चाहती है
वह आशाओं
और सपनों के तिनके
जमा कर रही है मेहनत से

तस्‍वीर में
मेरे होंठों पर अपनी
चोंच मारकर पूछती है
अपना घोंसला बनकर रहेगा न !

मैं
उस मासूम चिडि़या को
कैसे समझाऊं कि
बड़े-बड़े डैनों और पंजों
वाले बाज
इंतजार कर रहे हैं उस वक्‍त का
जब वह
बनाकर अपना घोंसला
खुशी से फूली न समाना चाहेगी
तभी वे उसके घोंसले को
तहस-नहस कर खुशी को गम में बदल देंगे

नोच लेंगे
सुन्‍दर सुन्‍दर पंख
और फिर छोड़ देंगे असहाय

न वह उड़ सकेगी
ख्‍याबों के आसमान में
न तैर पाएगी
मधुर स्‍मृतियों के समंदर में
वह सिर्फ काम आएगी
गरम गोश्‍त के व्‍यापारियों के

वह एक मासूम चिडि़या......!
                                     0 राजेश उत्‍साही

(लगभग 30 बरस पहले लिखी गई यह कविता 20 मार्च को गौरया दिवस पर याद हो आई। यह 1984 के आसपास कथाबिंब,मुम्‍बई पत्रिका द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह में मौजूद है।)

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