शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

लिफ्ट मांगते बच्‍चे


पीठ पर
बस्‍ता लादे
सड़क किनारे
लिफ्ट मांगते बच्‍चे
स्‍कूल आने से पहले
सीखते हैं अस्‍वीकृत होना
सीखते हैं अस्‍वीकृति को स्‍वीकारना
सीखते हैं असंकोचीपना
सीखते हैं बेशर्म होना
सीखते हैं असंवेदनशीलता
सीखते हैं हिकारत की भाषा
सीखते हैं वे दुनिया को गरियाना। 


पीठ पर
बस्‍ता लादे
सड़क किनारे
लिफ्ट मांगते बच्‍चे
स्‍कूल पहुंचने से पहले
सीखते हैं अच्‍छे और बुरे का फर्क
सीखते हैं सूरत और सीरत का फर्क
सीखते हैं दुनिया को संबोधित करना
सीखते हैं अपने लिए जगह खोजना
सीखते हैं वे शुक्रिया अदा करना।

पीठ पर
बस्‍ता लादे
सड़क किनारे
लिफ्ट मांगते बच्‍चे
कितना कुछ सीखते हैं
बिना कुछ सिखाए ही
बिना स्‍कूल जाए।
0 राजेश उत्‍साही

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

पिता को याद करते हुए




1.
पिता
पिता जैसे ही थे
अच्‍छे  
लेकिन
इतने भी नहीं कि
उन्‍हें बुरा न कह सकूं।

2.
पिता
बहुत प्‍यार करते थे
अपनी मां से,
इसलिए
कभी कभी
हमारी मां की पीठ
हरी नीली हो जाया करती थी।  

3.
पिता
रेल्‍वे के मुलाजिम थे
ईमानदारी से कमाई रोटी
पकती थी
जुगाड़ की आंच पर ।


4.
पिता
जुआ नहीं खेलते थे
पर सट्टे का गणित लगाते थे   
जीतते थे कि नहीं, क्‍या पता
पर जिंदगी में हारते कभी नहीं देखा।

5.
पिता
कभी सुन नहीं पाए
हमारे मुंह से पिता
सबके
बाबूजी
हमारे भी थे।

6.
पिता
सूक्तियों में मरने की हद तक
विश्‍वास करते थे,
शेर की नाईं चार दिन जियो
गीदड़ की तरह सौ साल जीना बेकार है
वे जिये इसी तरह।

7.
पिता
कहते थे
आत्‍महत्‍या समाधान नहीं है,
इससे समस्‍या नहीं हम स्‍वयं खत्‍म हो जाते हैं
आत्‍महत्‍या के तमाम असफल प्रयासों
के लिए जिम्‍मेदार
उनके ये शब्‍द ही हैं जो    
अंतिम क्षणों में याद आते रहे।

0 राजेश उत्‍साही

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