रविवार, 11 अगस्त 2013

नागपंचमी




याद आया कि
भुंसारे भुंसारे अम्‍मां
गई होंगी खोजने गाय का
ताजा गोबर
उससे बनाएंगी वे दरवाजे की दीवार पर
नागदेवता की आकृति

याद आया कि
कबीर और उत्‍सव की परंपरा में  
पूजा और आस्‍था
पूछेगीं दादी से जब इसके बारे में
तो बताएंगी वे
कुल देवता हैं अपने ये करूआ खांजा बब्‍बा

याद आया कि
रखेंगी कटोरी में दूध
चने और चिरोंजी का प्रसाद
लगाएंगी आवाज
नारियल फोड़ने के लिए  

याद आया कि
अम्‍मां कहेंगी ऊंची आवाज में
कि तवा नहीं चढ़ेगा आज रसोई में

याद आया कि
अपन तो रंगीन पेंसिल से
ही बना देते थे नागदेवता की मुस्‍कराती आकृति
कि महाशय हमेशा डराते ही रहते हो
कम से कम आज तो मुस्‍करा लो
अब गोबर खोजने कौन जाए
और वह मिलेगा कहां

याद आया कि
कुछ दिनों बाद
अम्‍मां कटोरी लिए
कह रही होंगी,
अरे ये नागपंचमी का प्रसाद
खाकर खत्‍म करो ।
0 राजेश उत्‍साही 

सोमवार, 10 जून 2013

हमारे होने में



हमारे होने में 
किन लोगों का हाथ है 
और किनके होने में हमारा
यह 
या तो हम खुद जानते हैं 
या फिर खुदा
बशर्ते कि वह कहीं हो !
o राजेश उत्‍साही


शनिवार, 6 अप्रैल 2013

एंटालिका*



रोज इस जंगल से गुजरता हूं
जंगल में मेरी चीख गूंजती है पेड़-पेड़ तक
पेड़ उसे अपनी ही चीत्‍कार समझते हैं
और चुप रहते हैं देर देर तक
रोज इस जंगल से गुजरता हूं

रोज गुजरता हूं दरकती जमीन से
जमीन के सीने पर गिरते मेरे कमजोर कदम
बताते हैं उसे मेरी प्‍यास के बारे में
मिट्टी उसे अपनी ही प्‍यास समझती है
और,
थोड़ा और तड़क जाती है अपने में
रोज गुजरता हूं दरकती हुई जमीन से

रोज गुजरता हूं एंटालिकाओं के बीच से
एंटालिकाओं की दीवार से टकराती है मेरी हाय
वे उसे अपने में सींचे गए खून की हाय समझती हैं
और,
और थोड़ी ऊंची हो जाती हैं सतह से
रोज गुजरता हूं एंटालिकाओं के बीच से
                                                                                                                                     
एक दिन गुजर ही जाऊंगा
लेकिन त‍ब भी ,
यह जंगल, जमीन और एंटालिका
आएंगे मेरे मृत सपनों में ।
0 राजेश उत्‍साही
(एंटालिका मेरा बनाया हुआ प्रतीक शब्‍द है। मुम्‍बई में मुकेश अंबानी के घर का नाम एंटीलिया है। कहा जाता है कि यह हिन्‍दुस्‍तान का सबसे महंगा घर है। इसकी लागत दस हजार करोड़ रुपए से भी अधिक बताई जाती है।)

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

अनुभव


                                                                             राजेश उत्‍साही
अतीत के कूप से
जरूरत के लोटे से 
अनुभवों का जल खींचता हूं
कार्यों की फसल बोने से पहले
वर्तमान को सींचता हूं।
0 राजेश उत्‍साही

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