रविवार, 9 दिसंबर 2012

दोस्‍त


पुराने शहर के
दोस्‍त हैं कि बहुत याद करते हैं
ईमेल पर फेसबुक पर
एसएमएस पर
फोन पर
लुटाते हैं लाड़ प्‍यार

लेकिन जब जाता हूं शहर
साल छह महीने में  
चाहे जितना स्‍टेटस लगाऊं
चाहे जितना फेसबुक पर चिल्‍लाऊं
कोई मिलने नहीं आता

सच तो यह है कि मैं भी कहां जाता हूं
दोस्‍त हैं कि बहुत याद आते हैं।
0 राजेश उत्‍साही      

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

दीपावली एक शुभकामना है


                                                                        फोटो :राजेश उत्‍साही
 बाजार दिवाली का सजा है
रंग बिरंगी छाई ध्‍वजा है
जिनकी जेब में आए हैं पैसे
असली तो उनका मजा है
खुशियों से उनका सामना है
दीपावली एक शुभकामना है
****
साल भर सपने हैं देखे
बांचा करे अपने ही लेखे
साकार होने की जो बारी
गए हैं रसातल में फेंके
कहें किससे अपनी चाहना है
दीपावली एक शुभकामना है
****
जमाने की रीत यही है
जो गलत है वही सही है
हम तो फर्ज पर हैं कायम
सबके सामने अपनी बही है
दामन हौसले का थामना है
दीपावली एक शुभकामना है
****
 दीप अपने मन क बनाएं
में नेह की बाती जलाएं
करकट सब जले कलुष का
समभाव का प्रकाश फैलाएं
जीवन चार दिन पाहुना है
दीपावली एक शुभकामना है
 0 राजेश उत्‍साही


सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

गांधी का रास्‍ता

                                                                                    राजेश उत्‍साही 
(1)
पहले हमने गांधी को पढ़ा
फिर हमने गांधी को गढ़ा

पहले हमने गांधी को मार दिया
फिर हमने गांधी को याद किया

(2)

गांधी जी कहते थे
तुम दुनिया में जैसा बदलाव देखना चाहते हो,
पहले वैसा बदलाव स्‍वयं में लाओ।
हम सब वही कर रहे हैं,जैसी दुनिया बनाना चाहते हैं
वैसे ही अपने को बदल रहे हैं।
हम गांधी के बताए रास्‍ते पर ही तो चल रहे हैं।
                                0राजेश उत्‍साही    

रविवार, 23 सितंबर 2012

समय समय की बात है

                                                                      फोटो : राजेश उत्‍साही 

 (1)
एक समय था
जब लोग राह चलते
हाथ पर बंधे
समय को देखकर
पूछते थे
क्‍या समय हुआ है?

अब समय है कि
वह जेब में समा गया है
लोग जब चाहें तब बटन दबाकर
देख लेते हैं।

(2)
एक समय था
जब
हाथ पर बंधा समय
आदमी के सम्‍पन्‍न होने का
विज्ञापन था

आज
हाथ पर बंधा समय
विपन्‍नता की निशानी है
सम्‍पन्‍न लोग तो उसे जेब में रखते हैं।


(3)
एक समय था
जब
रेडियो पर
आती बीप बीप की आवाज से
लोग अंदाज लगाते थे कि
सुबह के आठ या रात के पौने नौ बज रहे हैं
और
यह समय है समाचारों का

अब
समय है कि
हर समय एक समाचार की तरह
ही आता है।
0 राजेश उत्‍साही 

रविवार, 26 अगस्त 2012

औचित्‍य


                                                                                                               राजेश उत्‍साही 
हमारे बदलने 
न बदलने से
इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि चलती रहती है
दुनिया है कि बदलती रहती है।

हमारे रोने
न रोने से
इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि हंसती रहती है
दुनिया है कि चहकती रहती है।

हमारे होने
न होने से
इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि ढलती रहती है
दुनिया है कि मचलती रहती है।

हमारे गलने
न गलने से
दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि गलती नहीं है
दुनिया है कि पिघलती नहीं है

हमारे खटने
न खटने से
दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि खटती रहती है
दुनिया है कि भटकती रहती है।

हमारे मिटने
न मिटने से
दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि मिटती रहती है
दुनिया है कि संवरती रहती है।
 
हमारे
बदलने, रोने,गलने,खटने,मिटने, होने
और ऐसी तमाम अनगिनत क्रियाओं से  
किसी को फर्क पड़े न पड़े
हमें तो फर्क पड़ना ही चाहिए

वरना
बदलने,रोने,गलने,खटने,मिटने,होने
और ऐसी तमाम अनगिनत क्रियाओं
का क्‍या औचित्‍य !
0 राजेश उत्‍साही

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