शनिवार, 11 अगस्त 2012

होशंगाबाद में नर्मदा



                                                                                                   गूगल सर्च से साभार 
(1982 में लिखी गई एक और कविता)
यह है होशंगाबाद
मालवा के मुगल बादशाह
होशंगशाह का बसाया नगर

मध्‍यप्रदेश की जीवनधारा
नर्मदा के
किनारे बसा होशंगाबाद

सोमवती अमावस्‍या हो
शिवरात्रि या मकर संक्रांति
रेलें ठसाठस
भरी होती हैं

सिर पर रखे पोटलियां
कंधों पर लादे बच्‍चे
लोग उतरते हैं
होशंगाबाद के रेल्‍वे प्‍लेटफार्म पर

छमिया किते गई
गुड्डू कां हैं
और बड़े वीर
जा तरफ से निकल चलो
जैसी तमाम आवाजों से गूंज उठता है स्‍टेशन

टिकट बाबू
जो दे,वो भी जाए
जो न दे,वो भी जाए
की अदा में
खड़ा रहता है निर्विकार
सफेद पैंट और काले कोट में

बस अड्डे पर
बसों का रहा-सहा
कचूमर निकलने को हो आता है
एक के ऊपर एक
लदे-फदे लोग ठसे रहते हैं बसों में

सारे नगर की
गलियां,नर्मदा घाट तक
पटी रहती हैं जनसमूह से
कंधे छिलते हैं
और ‘भाई’ लोग मनाते हैं
मसक चौदस

फुटपाथ पर
उतर आती हैं
हिव्‍सकी और रम की खाली बोतलें
लोग खरीदते हैं
और भरते हैं उनमें नर्मदा जल
लगाते हैं श्रद्धा से माथे के साथ

लाल आंखों और पीली वर्दी में
नाव में सवार
घूमते रहते हैं मगरमच्‍छ
नर्मदा में एक सिरे से दूसरे सिरे तक
नाव के पास आते ही
सहम जाती हैं घाट पर स्‍नान करती महिलाएं

इंस्‍पेक्‍टर सा‍हब
ऊपर गुरजे पर खड़े मुस्‍काराते हैं
अपने कारिंदों की कारगुजारी पर

अकील अहमद
कानपुर वाला
बेचता है सेठानी घाट पर
शिव की मूर्ति
शंख,आरती थाली
बड़े फन वाला तांबे का नाग
भगवान का सिंहासन,आचमनी
और पूजा पाठ
की तमाम चीजें

सरताज बानो और उसकी बहनें
जाती हैं पल्‍ले पार
नहाने नर्मदा में।
0 राजेश उत्‍साही  

सोमवार, 6 अगस्त 2012

नर्मदा

                                                                          दैनिक भास्‍कर के सौजन्‍य से
(होशंगाबाद, मप्र से छोटे भाई अनिल ने खबर दी है। वहां इतनी बारिश हुई है कि घर में पानी भर गया है। 1982 में भी ऐसे ही हालात हुए थे। तब यह कविता लिखी गई थी।)
नर्मदा में
निरंतर चढ़ रहा है पानी
चेतावनी
देती सरकारी जीप
सारी रात
दौड़ती रही

निचली बस्तियों के
रहवासियो
करो खाली करो झोपडि़यां
पहुंचों स्‍कूलों में
शरण शिविरों में

मां नर्मदे
निरंतर चढ़ रही हैं
खतरे का निशान,
अब पार किया,तब पार किया

काले महादेव डूब गए हैं
कहते हैं काले महादेव डूब गए
यानी
पानी शहर में होगा

नर्मदा आ गई है
सुभाष चौक तक
घुटने-घुटने पानी में
खड़े लोग देख रहे हैं
विकराल रूप

बाजार में छाया है
भय
आज का नहीं
73 की बाढ़ का

सेठिए
खाली कर रहे हैं
दुकानें
घबराए हुए
मुख्‍य बाजार
इतवारा बाजार
लद रहा है ट्रकों और हाथ ठेलों पर
लगाया जा रहा है
ऊंची और सुरक्षित अट्टालिकाओं में

मैंने देखा
ठेठ नर्मदा की
पिचन पर
बनी झोपडि़यों में
गाई जा रही है आल्‍हा
उसी लय में
जिस लय में चढ़ रही है
नर्मदा निरंतर ।

0 राजेश उत्‍साही 

रविवार, 5 अगस्त 2012

दोस्‍त


                                                                               राजेश उत्‍साही 
दोस्‍त
बिछुड़कर भी
जो आता रहे
याद।
*
दोस्‍त
की
केवल एक ही जाति होती है
केवल एक ही राशि होती है
केवल एक ही धर्म होता है
केवल एक ही वर्ग होता है
केवल एक ही रंग होता है
केवल एक ही ढंग होता है
केवल एक ही कर्त्‍तव्‍य होता है
केवल एक ही अधिकार होता है
दोस्‍ती
*
दोस्‍त
अच्‍छा या बुरा
नहीं होता
दोस्‍त होता है।


0 राजेश उत्‍साही
                             

शनिवार, 28 जुलाई 2012

अपूर्वा


                                                                                                                     फोटो :विपुल नाकुम 
अपूर्वा
खड़ी हो तुम
जिंदगी की गीली रेत पर
कोई बात नहीं
धंसने दो पैरों को
वे यथार्थ की ठोस जमीन
जल्‍द ही पा लेंगे

बस
अपनी नजर लक्ष्‍य पर
इसी तरह गढ़ाए रखना

मैं देख रहा हूं
अथाह जलराशि से
होड़ लेती तुम्‍हारी आंखें
सपनों से लबालब हैं

आत्‍मविश्‍वास का नमक
उमड़ा आ रहा है चेहरे पर
स्मित खिल रही है होंठों पर
तनी हुई ग्रीवा
और
गर्व के साथ उठा मस्‍तक तुम्‍हारा
करता है आश्‍वस्‍त

तुम निश्चित ही
छुओगी एक दिन वे सब ऊंचाईयां
जिनके लिए निकली हो तुम
दायरे और बन्‍धन तोड़कर
चली आई हो दूर दूर बहुत दूर

पहुंचोगी उन सब मंजिलों पर
जिन्‍हें
फिलहाल गुड़ी-मुड़ी करके समा रखा है 
तुमने कंधे पर टंगे अपने झोले में।
                                    0 राजेश उत्‍साही
(अपूर्वा का चयन हाल ही में अज़ीमप्रेमजी फाउंडेशन के लिए हुआ है। उनकी तस्‍वीर फेसबुक पर देखकर यह कविता उपजी है। अपूर्वा की अनुमति से तस्‍वीर और कविता यहां प्रस्‍तुत है। शुक्रिया अपूर्वा। शुक्रिया विपुल नाकुम खूबसूरत तस्‍वीर लेने के लिए।)

शनिवार, 7 जुलाई 2012

बंगलौर बस में : दो


                                                                          फोटो : राजेश उत्‍साही 
लड़कियां,
जवान,
और बूढ़ी महिलाएं
खड़ी हैं अपनी तयशुदा सीट के सामने
एक हाथ में लिए
अपना सामान या कि बच्‍चे
और दूसरे हाथ से थामे
किसी सीट की पीठ
या ऊपर लगा सहारा
वे 
शायद संतुष्‍ट हैं
केवल बस में चढ़कर

लड़के,
जवान,अधेड़ हैं कि
बैठे हैं
अपनी बहन,प्रेयसी,बेटी,पत्‍नी या फिर मां के साथ
बेफिकर,बेशरम
अनदेखा करते हुए उन्‍हें जो हैं उन जैसी 
अनदेखा करते हुए लिखी हुई इबारत  

न कंडक्‍टर 
न ड्रायवर    
न बहन,प्रेयसी,बेटी,पत्‍नी या फिर मां को
न‍ किसी अन्‍य
यात्री को है इस बात से सरोकार

बहन,प्रेयसी,बेटी,पत्‍नी या फिर मां
कब करेंगी शरम
या कि प्रेरित
अपने भाई,प्रेमी,पति,पिता या बेटे को उठने के लिए
ताकि पा सके अपना हक उन जैसा कोई और   

मुझे है इंतजार ।
0 राजेश उत्‍साही 

सोमवार, 2 जुलाई 2012

बस में : एक


                                                                         फोटो : उत्‍सव पटेल
लड़कियां,
जवान,
और बूढ़ी महिलाएं
खड़ी हैं अपनी तयशुदा सीट के सामने
एक हाथ में लिए
अपना सामान या कि बच्‍चे
और दूसरे हाथ से थामे
किसी सीट की पीठ
या ऊपर लगा सहारा
वे 
शायद संतुष्‍ट हैं
केवल बस में चढ़कर

लड़के,
जवान,अधेड़ हैं कि
बैठे हैं बेफिकर,बेशरम
देखते हुए उन्‍हें
लिखी हुई इबारत को
करते अनदेखा

न कंडक्‍टर
न ड्रायवर और
न अन्‍य किसी
को है इस बात से सरोकार

ल‍ड़कियां,
जवान
और बूढ़ी महिलाएं
कब हड़काएंगी लड़कों,जवान या अधेड़ों को
छीनने के लिए
अपना हक

मुझे भी है इंतजार ।
0 राजेश उत्‍साही 

शनिवार, 16 जून 2012

पिता


                                                                            फोटो :राजेश उत्‍साही 
।।एक।।
कब्‍बू ने कहा
एक दिन
पापा मत जाओ
दफ्तर
छुट्टी है आपकी
खेलो हमारे साथ

कब्‍बू ने बनाया घोड़ा
बैठा पीठ पर
हांका घोड़े को
कहा थक गया तो बैठ
पानी पी
चल टिक टिक...
भूख लगी
तो दाना खा
चल टिक टिक...

घोड़े ने
सिर घुमाकर देखा
उसकी तरफ
वह मुस्‍कराया
और घोड़े की सारी
थकान दूर हो गई। 

।।दो।।
देखकर 
आइने में चेहरा अपना 
आजकल चौंक जाता हूं मैं

पिता अब नहीं हैं
क्‍यों याद आते हैं इस तरह वे?
 
।।तीन।।
पिता होना 
न होने पर पिता के 
अधिक महसूस होता है
होते हैं जब तक वे
हम बेफिक्री 
महसूस करते हैं। 
                        0 राजेश उत्‍साही 
  

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails