रविवार, 11 मार्च 2012

खुशी


खुशी
एक चिड़िया

बैठी पल दो पल कहीं 
फुर्र से उड़ गई 
आया जो मन में तो 
कुछ समय के लिए 
किसी तरू से जुड़ गई । 
    
0 राजेश उत्‍साही 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

याद : जिन्‍हें प्रेम करता हूं


                                                  फोटो: राजेश उत्‍साही 
तुम्‍हारी याद
जैसे,
बिजली का गुल हो जाना
आना एक पल को
और फिर गुल हो जाना
आभास होते रहना रोशनी का देर तक।
*
तुम्‍हारी याद
जैसे,
शांत चलती हुई
रेलगाड़ी के इंजन का
एकाएक चीख पड़ना
और आवाज का गूंजते रहना देर तक ।
*
तुम्‍हारी याद
अमरबेल-सी
छा जाती है
और चूसते रहती है
धीरे-धीरे।
*
तुम्‍हारी याद
एक आलपिन-सी
जिसके बिना
जिंदगी के पन्‍ने
बिखर जाते हैं यहां-वहां।
0 राजेश उत्‍साही 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

विडम्‍बना


                  फोटो : राजेश उत्‍साही 
।।एक।।
हम
बनाते हैं सुंदर अक्षरों की 
अनेक चि‍ड़ि‍यां
और पाते हैं चंद सिक्‍के
वे बिठाते हैं अपने हस्‍ताक्षर की 
केवल एक चि‍ड़ि‍या 
और पाते हैं ढेर-से।  

।।दो।।
संतरी
पहरा देता है मंत्री के घर
और मंत्री महोदय
लूटते हैं घर संतरी का।
0 राजेश उत्‍साही  

शनिवार, 28 जनवरी 2012

नेता माने



आरोप-प्रत्‍यारोप
की राजनीति में लिप्‍त
एक नेता से हमने कहा,
‘‘आप क्‍यों नेता शब्‍द को बदनाम कर रहे हैं? ’’
रोष में बोल वे,‘‘बदनाम !
अरे हम तो ‘नेता’ शब्‍द को चरितार्थ कर रहे हैं।’’
हमारी समझ में कुछ नहीं आया
तब उन्‍होंने बड़े प्‍यार से समझाया,
‘‘आप जानें या न जानें
‘नेता’ का उल्‍टा होता है ‘ताने’ ।’’
               0 राजेश उत्‍साही
(कंचनप्रभा 1979 के स्‍वाधीनता विशेषांक में प्रकाशित)

बुधवार, 25 जनवरी 2012

गणतंत्र बनाम गमतंत्र



                                        फोटो : राजेश उत्‍साही
छूटते हुए आसमान
और खिसकती हुई जमीन पर
कब तक खड़ा रह पाऊंगा मैं
अपना संतुलन बनाए
कब तक ?

माना कि मेरे हाथ में है कलम
और स्‍वतंत्र हूं मैं
 चाहे जिस पर लिखने के लिए
पर सवाल यह है 
कि क्‍या
बिके हुए गणतंत्र में
उभर पाएगी मेरी अभिव्‍यक्ति
तुम्‍हारे अखबारी दिमागों में ?
0 राजेश उत्‍साही  

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

स्‍वागत नए साल का



                                                                       फोटो : राजेश उत्‍साही 
पूछा मैंने
दोस्‍त से,
कैसे किया नए साल का
स्‍वागत ?

'बांधकर
कैलेंडर में
लटका दिया है
दीवार पर!'
वह बोली।

ठीक किया
अब रखना उसे
संभालकर,मैंने कहा।

सहेजना,जीना,
उसका हरेक दिन
कड़ी नजर रखना उन पर।

वरना
मौका मिलते ही
ति‍तलियों की तरह
गायब हो जाएंगे वे अनंत आकाश में
और तुम कहती
रह जाओगी
पता नहीं कहां चला गया नया साल
और
नए साल के दिन।
0 राजेश उत्‍साही

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

आओ फिर भी कहें, मुबारक नया साल !



  डॉलर के मुकाबले  
भाव हमें न मिले
सेंसेक्‍स में अपने
नहीं आया उछाल

आओ फिर भी कहें, मुबारक नया साल !
*
ऊपर वाले से गिला
हाय यह क्‍या सिला
छप्‍पर टूटा  ही रहा
और जल गई पुआल

आओ फिर भी कहें, मुबारक नया साल !
*
चले थे  जहां से हम
वहीं  आ  थमे कदम
बीत गया यूं ही बरस
हुआ नहीं कोई कमाल

आओ फिर भी कहें, मुबारक नया साल !
*
सपनों  को  थल नहीं
कश्‍ती को साहिल नहीं
उत्‍तरों  के हर द्वार पे
खड़े हैं  ज्‍वलंत सवाल

आओ फिर भी कहें, मुबारक नया साल !
*
दुनिया  में शोर हुआ
चर्चा भी घनघोर हुआ
भ्रष्‍टासुर संग साथ हैं
2012  बिन लोकपाल

आओ फिर भी कहें, मुबारक नया साल !
*
मजदूर  हैं  सब
मजबूर नहीं  रब
कुछ सोचे, समझे
हो न जाए बवाल

आओ फिर भी कहें, मुबारक नया साल !
                           *            
                                       0 राजेश उत्‍साही


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