गुजरते हुए
शाहपुरा झील के किनारे से
मैंने सोचा
खड़ा कर दूं स्कूटर एक तरफ
और उतर जाऊं
झील के अन्दर
कपड़े पहने-पहने ही
आसपास कोई नहीं है
हां सड़क पर आवागमन जारी है
सब अपनी धुन में हैं
किसे फुरसत है इधर-उधर देखने की
सोचा कैसे होगी
मेरी शिनाख्त
प्लास्टिक मढ़ा या कि चढ़ा
कोई आइडिंयेटी कार्ड नहीं है जेब में
हां लायसेंस जरूर है
पर वह तो पानी में गल चुका होगा
उस पर लिखे अक्षर घुल चुके होंगे
पेंट की पिछली जेब में
रखी डायरी
भी हो चुकी होगी तार-तार
और शायद उसके पन्ने भी
पानी की सतह पर उतरायेंगे
मेरी ही तरह
कुछ समय बाद
झील के किनारे
खड़ा रहेगा
बदरंग स्कूटर कुछ समय यूं ही
फिर खटकने लगेगा
लावारिस की तरह हर
आने-जाने वाले की आंख में
आने-जाने वाले की आंख में
फिर कोई राह चलता
भला मानुष
इत्तला कर देगा
थाने में फोन पर
आएगी पुलिस
पूछताछ करेगी
आसपास
फिर तोड़ेगी डिक्की
उसमें से निकलेंगे कागज
गाड़ी के
जिनमें होगा नाम पता मेरा
तब तक धंस चुका होऊंगा मैं
झील की गहराई में
गुजरते हुए
शाहपुरा झील के किनारे से
मैंने सोचा!
(ये सोच भी अजीब शह है। हम जब सोचना शुरू करते हैं तो क्या-क्या सोच लेते हैं। यह कुछ बरस पहले की अभिव्यक्ति है। शाहपुरा झील भोपाल में है। जब यह कविता दोस्तों को पढ़वाई तो कुछ अजीब सी प्रतिक्रिया हुई। जवाब में तीन-चार कविताएं और निकल आईं। वे बाद में।)
0 राजेश उत्साही
