आप जानते हैं,इन दिनों मैं गुलमोहर पर नीमा के बहाने एक लम्बी कविता लिख रहा हूं। इस कविता की तीन किस्तें आ चुकी हैं। चौथी अभी रची जा रही है। इस बीच आपको भी लग रहा होगा और मुझे भी लग रहा है कि चुप्पी कुछ ज्यादा ही लंबी हो गई है। इस चुप्पी को तोड़ने के लिए मैं अपनी एक कविता यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। यह गुलमोहर पर पहली बार आ रही है। हां ई-पत्रिका गर्भनाल के जुलाई अंक में यह प्रकाशित हो चुकी है। संभव है आप में से कुछ ने इसे वहां पढ़ लिया होगा। अगर आपको यह कविता अच्छी लगी होगी तो दुबारा पढ़ने में भी आप प्रसन्नता महसूस करेंगे।* राजेश उत्साही
लिखकर
एक कविता महसूस
करता हूं मैं
जैसे कई रातों की उनींदी आंखें
दिन-दिन भर सो उठती हैं तरोताजा होकर
एक
कविता लिखकर
महसूस करता हूं मैं
जैसे कोई गर्भणी सफल प्रसव के बाद
मातृत्व के उल्लास से
भर उठती है
जैसे
एक पिता
अपने नवजात शिशु को दुलारकर
भूल जाता है सृष्टि की नश्वरता
महसूस
करता हूं मैं
लिखकर एक कविता
जैसे
एक मेहनतकश भर दोपहरी में
रोटी पर रखकर प्याज
नीम तले
करता है ब्यालू
पीता है ओक से
लोटा भर पानी
और निकाल फेंकता है
सारी थकान
लेकर एक लम्बी डकार
लिखकर
महसूस करता हूं मैं
एक कविता
जैसे
घूमते हुए चाक पर
गीली मिट्टी से गढ़कर ठण्डा पानी
रोमांचित हो उठता है उसका सृजनकार
कुछ कुछ वैसा ही
महसूस करता हूं मैं
लिखकर
एक कविता।
नीमा के बहाने का तीसरा भाग प्रस्तुत है। हो सकता है यह आपको एक सपाट बयानी लगे। कविता कम कहानी ज्यादा लगे। सच तो यही है कि कहानी को ही कविता में कहने की कोशिश कर रहा हूं। नए पाठक कृपया इस कविता का संदर्भ समझने के लिए कविता के पहले और दूसरे भाग भी पढ़ें तो बेहतर रहेगा।
दोस्तो मेरी जीवनसंगिनी पर केन्द्रित कविता का दूसरा भाग प्रस्तुत है।कविता को अच्छी तरह आत्मसात करने के लिए नीमा के बहाने: एकभी पढ़ें तो बेहतर रहेगा।
नीमा
यानी निर्मला के आत्मज
कभी उत्तरप्रदेश के बीहड़ों से
निकलकर
महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा से सटे मप्र के
पश्चिम निमाड़ की उपजाऊ जमीन
में आ बसे थे
परमार राजाओं के गढ़ सेंधव यानी
सेंधवा में
किले के नीचे
सेंधवा
रहा है मशहूर
अपनी रुई की गरमाहट के लिए
आज का आगरा बंबई मार्ग यानी
राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक तीन इसके बीच से गुजरता है
यहीं 1959 के साल की पहली तारीख को
नीमा ने पहली किलकारी भरी
जीन में फिटर हुआ करते थे पिता
अस्सी साल की पकी उम्र में
उन्होंने इस दुनिया से ली विदा
उनके जाते ही
जैसे परिवार बिखर गया
घर का सुख जाने किधर गया
तीन भाइयों की दो बहनों में से एक
छोटे भाई से बड़ी लेकिन सबकी लाड़ली बहन
नीमा अभी छोटी ही थी
बड़े भाई अपने परिवारों में व्यस्त हो गए
बहनें,छोटा भाई और मां जैसे उनके लिए अस्त हो गए
बचपन मुफलिसी का खिलौना था मुफलिसी ही पालना था मुफलिसी ही बिछौना था पिता का बनाया कच्चा घर और खुद्दारी ही गहना था नन्हीं और नाजुक उंगलियां फूलों से जूझती थीं और खेल खेल में हीं उन्हें माला में गूंथती थीं
माला जो मंदिरों में जाती थी
समय के बायस्कोप ने ऐसे मंजर भी दिखाए
गिरवी रखने को न जेवर बचे थे, न बरतन रोटी के लिए तवे पर रखे आटे को बेच आए
परीक्षा की फीस जो चुकानी थी मां ने किया था तय बच्चों की पढ़ाई नहीं छुड़वानी थी
घर से स्कूल जाती-आती
हुई यह लड़की
रास्ते में कबीट के पेड़ से यह सब बतयाती
अपना सुख-दुख सुनाती
पेड़ सुनता गुनता और जैसे कहता
बिटिया जीवन मेरी तरह है कंटीला
मेरी पत्तियों की तरह खट्टा ,मेरे फल की तरह कठोर लेकिन अंदर से रसीला
इस दुनिया में ही है तेरी ठौर
समय बीतता गया
मुफलिसी के खिलौने टूटते गए
जिंदगी में यकीन जीतते गए
सेंधवा के
मोती बाग मोहल्ले की
दगड़ी बाई प्राथमिक कन्या शाला की यह कन्या
लड़कियों से ज्यादा लड़कों के साथ नजर आती
कंचे चटकाती
गिल्लियों को दूर दूर तक पहुंचाती
मोहल्ले के घरों के कांच तड़काती पर लड़की थी कि बाज नहीं आती
मिडिल स्कूल में
नाले के पार लड़के-लड़कियों के साथ पढ़ने जाती
और जब कोई बदतमीजी पर आता
एक ही धक्के में सीधा खानदेश पुल से नाले में जाता
लड़के थे कि खिसयाते
और रानी लक्ष्मीबाई कहकर चिढ़ाते
सेंधवा महाविद्यालय
की दीवारें और उन पर लिखी इबारत
इस बात की देती हैं गवाही कि नीमा ने यहां अपनी बात मनवाई
महाविद्यालय की चौखट में
छात्रा के रूप में कदम रखा
छात्रसंघ की अध्यक्षा का स्वाद चख्खा,
खो खो और कबड्डी खेली,
फर्राटा दौड़ लगाई और प्रतिद्वंदिता झेली हिन्दी साहित्य की स्नातकोत्तर कक्षा में पढ़ा और फिर पांच साल पढ़ाया परिवार से ज्यादा शायद अपना ही मान बढ़ाया
नीमा
आम आदमी की भाषा के
कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं में प्रयोगवाद पर शोध की तैयारी में जुटी थीं
पर वक्त ने कुछ इस तरह करवट ली कि वे दिल के हाथों लुटी थीं
सब कुछ तज के
मुझ जैसे आम आदमी की जिन्दगी के
वादों और विवादों की साक्षी बन गईं
नीमा के लिए
मैं वो आम आदमी था
जो उनके अलावा किसी और की
कसौटी पर खरा नहीं उतरता था
हां, मां ने
नीमा की मां ने कहा था
तुझे पसंद है तो मुझे क्या
तेरी खुशी में मेरी खुशी है
नीमा
ससुराल में बड़ी बहू बनकर
परिवार संभालने के
आदर्श की सनातन रंगबिरंगी झालरों
के बीच खो गईं सपनों का कैनवास जो सज रहा था उसे वक्त की लहर धो गई
गिनाने को कारण और देने को तर्क बहुत सारे हैं
पर हकीकत यही है कि मन के आगे कुछ निर्बलताएं उनकी रहीं
कुछ फरमान हमारे हैं
नर्मदा के किनारे
होशंगाबाद के सेठानी घाट
पर मधुमास में
निर्मल नीर में उतराते चांद को निहारते हुए उजियारी रात में
अपनी जीवनसंगिनी पर केन्द्रित यह कविता में पिछले साल भर से लिख रहा हूं। बीत गई 23 जून को हमारे वैवाहिक जीवन की रजत जयंती थी। सोचा था इस अवसर पर उन्हें इस कविता के माध्यम से शुभकामनाएं दूंगा। पर कविता पूरी नहीं हो सकी। अभी भी नहीं है। सोचता हूं कि जितनी है उसे यहां दूंगा तो उसे पूरी करने का नैतिक और भावनात्मक दबाव मेरे कवि पर बनेगा। तो जहां तक अभी पहुंच पाया हूं, उसे आप भी पढ़ें।