रविवार, 26 अगस्त 2012

औचित्‍य


                                                                                                               राजेश उत्‍साही 
हमारे बदलने 
न बदलने से
इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि चलती रहती है
दुनिया है कि बदलती रहती है।

हमारे रोने
न रोने से
इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि हंसती रहती है
दुनिया है कि चहकती रहती है।

हमारे होने
न होने से
इस दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि ढलती रहती है
दुनिया है कि मचलती रहती है।

हमारे गलने
न गलने से
दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि गलती नहीं है
दुनिया है कि पिघलती नहीं है

हमारे खटने
न खटने से
दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि खटती रहती है
दुनिया है कि भटकती रहती है।

हमारे मिटने
न मिटने से
दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता
दुनिया है कि मिटती रहती है
दुनिया है कि संवरती रहती है।
 
हमारे
बदलने, रोने,गलने,खटने,मिटने, होने
और ऐसी तमाम अनगिनत क्रियाओं से  
किसी को फर्क पड़े न पड़े
हमें तो फर्क पड़ना ही चाहिए

वरना
बदलने,रोने,गलने,खटने,मिटने,होने
और ऐसी तमाम अनगिनत क्रियाओं
का क्‍या औचित्‍य !
0 राजेश उत्‍साही

15 टिप्‍पणियां:

  1. सही लिखा जी ...जब खुद को फर्क पड़ेगा तभी हम दुनिया में खुद के वजूद के लिए लड़ पायेंगे

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  2. 'क्या फर्क पडता है" और "चलता है" जैसी मनोवृत्ति ने हमारे तमाम मूल्यों के औचित्य पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है... आपकी कविता इसी सवाल का जवाब ढूँढने को प्रेरित करती है.. प्रेरक, भाई साहब!

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  3. हम जो कार्य करते हैं , उसका कारण और दिशा स्पष्ट हो तो बात वरना सिर्फ चीखना और चिल्लाना ही तो !

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  4. फर्क पड़े ना पड़े .... यह हो ही जाता है

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  5. वाह ! हम जो भी करते हैं उसका फर्क हम पर तो पड़ता है..हम भी तो इसी दुनिया के हिस्से हैं,हम ही तो दुनिया हैं...

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  6. वरना
    बदलने,रोने,गलने,खटने,मिटने,होने
    और ऐसी तमाम अनगिनत क्रियाओं
    का क्‍या औचित्‍य !
    बिल्‍कुल सही कहा है आपने ... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. DOONIYA PAGAL HAI ? YA PHIR MAI DIWANA !

    UDAY TAMHANEY
    BHOPAL

    उत्तर देंहटाएं
  8. DOONIY PAGAL HAI ?
    YAA PHIR MAI DIWANA !

    UDAY TAMHANE
    BHOPAL

    उत्तर देंहटाएं
  9. सच कहा है ... हमें तो फर्क पड़ना ही चाहिए ...
    बदलाव की शुरुआत भी तभी होगी जब अपनी मानसिकता बदलेगी ...

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  10. बस यही सार है..किसी को फर्क पड़े ना पड़े...हमें फर्क पड़ना चाहिए.
    अच्छी कविता

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  11. दुनिया को फर्क पड़े या न पड़े खुद को फर्क पड़ना चाहिए ... तभी इन सब बातों का औचित्य है ॥विचारणीय रचना

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  12. :) फ़र्क तो पड़ता ही है, भले ही उसमें सारी दुनिया शामिल न हो!

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  13. हमे तो फर्क पड़ना ही चाहिए। लेकिन हम संवेदना शून्य हो रहे हैं।

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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