गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

मरने से पहले

              

                                                                     छाया: राजेश उत्‍साही
                                                                                                                     
मैं 
बिखर जाने से पहले 
जीना चाहता हूं
फूल भर जिन्‍दगी
महकाना चाहता हूं
सुवास अपनी


मैं
हवाओं में विलीन होने से पहले
हंसना चाहता हूं
उन्‍मुक्‍त हंसी
भरकर फेफड़ों में
शुद्ध प्राणवायु


मैं
नष्‍ट होने से पहले
चूमना चाहता हूं
एक जोड़ी पवित्र होंठ
तृप्‍त होने तक

मैं
देह विहीन से होने से पहले
स्‍वीकारना चाहता हूं
अपराध अपने
ताकि
रहे आत्‍मा बोझविहीन

मैं
चेतना शून्‍य होने से पहले
सोना चाहता हूं
रात भर
इत्‍मीनान से
ताकि न रहे उनींदापन

सच तो
यह है कि
मैं
मरना नहीं चाहता हूं   
मरने से पहले ।

0 राजेश उत्‍साही

 **************
रश्मिप्रभा जी और रवीन्‍द्र प्रभात जी द्वारा संचालित ब्‍लाग वटवृक्ष पर यह कविता  27 अक्‍टूबर प्रात: 11 बजे से 28 अक्‍टूबर की दोपहर बाद 4 बजे तक लगभग 30 घंटे तक रही। मैं वटवृक्ष का आभारी हूं। वटवृक्ष पर आए पाठकों ने क्‍या कहा उसका एक संक्षिप्‍त विवरण यहां है। वंदना, संजय भास्‍कर, एम वर्मा, वाणी गीत, मुकेश कुमार सिन्‍हा : एक सुन्‍दर सकारात्‍मक सोच दर्शाती रचना। नरेन्‍द्र व्‍यास, कविता रावत, सुज्ञ, सुनील कुमार : आत्‍म मंथन का सुन्‍दर चिंतन और दार्शनिक भाव। देवेन्‍द्र पाण्‍डेय: अंतिम पंक्तियों में कविता अपने पत्‍ते खोलती है। एक सशक्‍त कविता। 

अरुण सी राय: कविता शुरू से साधारण लगती हुई अचानक अंतिम पंक्तियों में असाधारण हो जाती है.. जीवन के प्रति अदम्य जिजीविषा इन पक्तियों में है.. जहाँ आज के समय में जब मूल्य बदल रहे हैं, जीवन के मायने बदल रहे हैं.. एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं हम.. खास तौर पर मानसिक स्तर पर.. हम हर पल किसी ना किसी तरह मर रहे हैं.. ऐसे में यह कविता जीवन के प्रति प्रतिबद्धित दिखती है।  

बिहारी ब्‍लागर यानी सलिल वर्मा: ज़िंदगी को नापने का पैमाना ही हमने बरसों का बना लिया है,जबकि ज़िंदगी तो बस जीने और मरने के दो खूँटे के बीच की दौड़ है. कवि ने जीवन की इस दौड़ के जिन पड़ाव का वर्णन किया है, वही जीवन को जीवन बनाते हैं और उनका न होना मृत्यु! राहुल सिंह: 'मरना नहीं चाहता हूं, मरने से पहले' इसीलिए तो कविता बन पाई है। प्रवीण पाण्‍डेय: जीवन को जी लेने की उत्कट अभिलाषा, समय का चौंधियाना हमारी आँखों में, बचने का उपक्रम, छाँह ढूढ़ने का प्रयास। 

बलराम अग्रवाल: 'वस्तुत: तो यह मानवीय सरोकारों की कविता है। इसमें 'मैं' को 'व्यष्टिवाची' न देखकर 'समष्टिवाची' देखने से यह व्यापक अर्थयुक्त कविता है। कवि को इस व्यापक सहृदयता के लिए बधाई।' शिखा वार्ष्‍णेय, अजित वडनेकर,आशीष,ZEAL, मजाल,अंजाना को भी कविता अच्‍छी लगी। 

 ..........अब आपकी बारी है।

32 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन को नए सिरे से परिभाषित करती.
    जीवन के नए अर्थों का सृजन करती..
    जीवन की सार्थकता बताती...
    जन्म और मृत्यु के बीच पसरे जीवन के दर्शन कराती, एक कालजयी रचना!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. 7/10

    "सम्वेदना के स्वर" ने मेरे दिल की बात कह दी.
    बेहतरीन रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. Dear Utsahi Ji,
    Bahut heee achchi kavita hai........Dil ko chhu gai.
    Regards'
    Harish

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया कविता हैं, ये लाइनें

    चेतना शून्‍य होने से पहले
    सोना चाहता हूं
    रात भर इत्‍मीनान से
    ताकि न रहे उनींदापन

    Thanks & Regards
    Parul Batra

    उत्तर देंहटाएं
  5. jitni mehnat aap mail krne mein aur logo ko ye batane mein krte hain ki aapaki rachnayein kahan kahan hain.. Utni hi mehnat accha padhne mein aur likhne mein karein, lekhni mein kafi sudhar aayega..
    Bheje gaye mail ke star ke hisaab se yeh rachna halki lagi, mujhe jo hissa pasand aaya wo hai ye
    मैं
    नष्‍ट होने से पहले
    चूमना चाहता हूं
    एक जोड़ी पवित्र होंठ
    तृप्‍त होने त

    मैं
    देह विहीन से होने से पहले
    स्‍वीकारना चाहता हूं
    अपराध अपने
    ताकि
    रहे आत्‍मा बोझविहीन
    yeh sab aap marne se ain pehle ki bajaye, bahut pehle kr payenge..
    Keep improving

    उत्तर देंहटाएं
  6. @ शुक्रिया दिपाली जी यहां आने का।

    आपकी टिप्‍पणी से मेरा यह ज्ञानवर्द्धन हुआ कि कविता या रचना को परखने के लिए भेजे गए मेल का स्‍तर भी एक पैमाना होता है।

    माफ करें, आपकी रचनाओं और आपके बारे में जानने की चाह में मैं आपके चारों ब्‍लाग पर गया। पर वहां कुछ भी पता नहीं चला। इतनी साफगोई से बात कहने वाले हमेशा परदे के पीछे ही क्‍यों रहते हैं 'मरने से पहले' मैं यह भी जानना चाहता हूं।

    ऐसा अनुरोध मैं पहले भी आप जैसे अन्‍य उस्‍तादों से भी कर चुका हूं। समय मिले तो इस पर भी विचार करें।

    उत्तर देंहटाएं
  7. मृत्यु वरण करने से पहले की सारी चाह जीवन दर्शन को कह रही है ..अच्छी अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  8. कठिन है, इस कविता पर कुछ कह पाना, बहुत कठिन; यह स्‍पष्‍ट दिख रहा है कि इसपर सही प्रतिक्रिया देने के लिये कविता का तत्‍वज्ञान आवश्‍यक है । इतना जरूर कह सकता हूँ कि जिसका जीवन एक उद्देश्‍य के प्रति भी प्रतिबद्ध हो गया उसे सही अर्थों में जीने का कारण मिल जाता है और वह अपना जीवन सार्थक भी कर जाता है।
    यहॉं कवि मृत्‍युपूर्व अपनी सुवास बिखराना चाहता है, स्‍वाभाविक है कि ऐसे कृत्‍यों के प्रति प्रतिबद्ध है जिनसे सुवास बिखरे, उन्‍मुक्‍त हँसी चाहता है तो स्‍वाभाविक है कि उससे ऐसे कारण भी जुड़़े होंगे जो उसे बन्‍धन आडम्‍बर रहित हँसी दे सकें, उसमें उस प्रगाढ़ प्रेम की चाह है जो हमारी संस्‍कृति में 'दिल से रे' के पारिवारिक संबंधों में ही संभव है, उसमें शरीर त्‍याग से पहले अपने अपराध स्‍वीकारने का साहस है, क्‍या-क्‍या नहीं है। अब सकारात्‍मक उद्देश्‍य लेकर तो जीना ही संभव है, मर नहीं सकते। लंबा मृतप्राय: जीवन जीने से अच्‍छा तो यही है कि जितना जियें भरपूर जियें। Live life King size.

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  9. राजेश जी, बहुत अच्छी रचना है...
    वहां भी पढ़ा, यहां भी...अलग ही अहसास दे रही है.

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  10. Rajesh jee rachana acchee lagee.aapke jeevan darshan kee jhalak hai iseme.
    aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  11. sir pranam !
    aap ki chhoti kavitae achchi lagi , '' main '' wali bahut sunder lagi .
    sadshuwad
    saadar

    उत्तर देंहटाएं
  12. pahli bar aapke blog par aana hua...mrityu ko thenga dikahti maanviya ushma se behad labaalab kavita padhwane ka shukriya bhai....

    yadvendra

    उत्तर देंहटाएं
  13. राजेश जी आपकी कविता पर टिप्पणी क्या करूंगा! गुलमोहर के फूल कैसे लगे .... बताना पड़ेगा?!!!

    उस्ताद जी ७/१० दिए हैं, कंजूस कहीं के!!

    अपनी बात कहूंगा। १७.०० हो रहे हैं कंप्यूटर की घड़ी में ... खिड़की से देखता हूं, पच्छिम में सूरज अस्ताचल हो रहा है। ....और ...
    मन में हौले-हौले चल रही है रघुवीर सहाय की कविता आज फिर शुरु हुआ की पंक्तियां .....
    आज फिर शुरु हुआ जीवन
    आज मैंने एक छोटी सी सरल सी कविता पढी
    आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा

    उत्तर देंहटाएं
  14. इस रचना की तारीफ़ में जितना कहूँ उतना ही कम होगा - एक उत्कृष्ट रचना पढवाने के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  15. मरना नहीं चाहता
    मरने से पहले

    इन दो पंक्तियों में एक महाकाव्य छुपा हुआ है।

    उत्तर देंहटाएं
  16. arre.. Ye kisne kaha ki blog pr apna parichay likhna padega? Kavitayon ke liye blog banaya tha..wahi to karungi.. Haan haan intro mein jitna jaruri tha utna likha diya, baaki us sse jyada rishte mujhe banane nhi, bahut hain mere paas..
    Aur rahi ustaad ki baat to sorry main ustaad nhi hun, m a learner, n i learn every moment
    jis tarah se style maar ke aap sabko ek hi mail bheja, to main kaafi impres hui.. Pr yahan aa kr mera utsaah jaata raha..
    Yaar ek baat bataao ab aai hun to padhungi na, baakki kai logo ki tarah title dekh kr acchi rachna likh dun to challega aapko?
    Agar aisa hai to chalo ji
    buhut acchi rachna hai.. Blog pr bulane ka shukriya.

    उत्तर देंहटाएं
  17. arre.. Ye kisne kaha ki blog pr apna parichay likhna padega? Kavitayon ke liye blog banaya tha..wahi to karungi.. Haan haan intro mein jitna jaruri tha utna likha diya, baaki us sse jyada rishte mujhe banane nhi, bahut hain mere paas..
    Aur rahi ustaad ki baat to sorry main ustaad nhi hun, m a learner, n i learn every moment
    jis tarah se style maar ke aap sabko ek hi mail bheja, to main kaafi impres hui.. Pr yahan aa kr mera utsaah jaata raha..
    Yaar ek baat bataao ab aai hun to padhungi na, baakki kai logo ki tarah title dekh kr acchi rachna likh dun to challega aapko?
    Agar aisa hai to chalo ji
    buhut acchi rachna hai.. Blog pr bulane ka shukriya.

    उत्तर देंहटाएं
  18. राजेश जी काव्य की बारीकियों से ज़्यादा आप ने जिंदगी की बारीकियों को उकेरा है प्रस्तुत कविता में| आप जैसे स्थापित फनकार की तारीफ क्या करूँ मैं| फिर भी जो खास लगा वो लिखने से खुद को रोक नहीं सका| शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  19. जीवन की जिजीविषा हमें हर स्थितियों में जिलाए रखती है हमारे वीतरागी होते जाते मनों को रागात्मकता के कोमल पाशों से बांधकर रखती है. हमारे अंधेरे पलों में उम्मीद की किरण बन कर जीती है और जिंदगी की लय को हमारी सासों में भर, एक सुंदर गीत बना उसे गुनगुनाने का हौसला देती है. एक खूबसूरत और संवेदनशील और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  20. @शुक्रिया दिपाली जी।

    मैंने तो नहीं कहा कि आप अपना परिचय ब्लाग पर लगाइए। मैं तो कह रहा हूं कि जानने की चाह में गया था। कुछ पता नहीं चला। अगर आप मेरी कविता पर इतनी गम्भीर टिप्पणी कर रही हैं तो यह जानने की इच्छा तो होगी ही कि आखिर आप हैं कौन। वरना यहां तो बहुत से बेनामी अपनी टिप्पणी करते ही रहते हैं।

    आप कहती हैं तो मान लिया कि आप उस्ताद नहीं हैं। अगले ही पल आप कहती हैं कि मैं तो सीख रही हूं। सच्चा सीखने वाला केवल सीखने की बात ग्रहण करता है वह दूसरों पर फिकरे नहीं कसता। और हां..... आपके रिश्ते आपको मुबारक हों। पर जरा यह भी बता दीजिए 'यार' किसी रिश्ते में आता है या नहीं।

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  21. कविता बेहद सुन्दर लगी.. कितने बिम्बों को छूती हवी ..जिंदगी से भरपूर..मौत की बात कहती है .. लेकिन जिंदगी भर देती है..
    यह कविता मैंने वटवृक्ष में भी पढ़ी ..टिपण्णी की लेकिन आज ही .. बहुत सुन्दर रचना है ..

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  22. कविता अपनी सादगी में भी विलक्षण है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  23. जीवन हमेशा से कुछ नए अर्थ खोजता रहता है ... और कवि उन अर्थों को नया रूप ... आपने भी इस कविता के माध्यम से जीवन के कुछ नए अर्थ तलाशे हैं ... बहुत ही खूबसूरत शब्दों में ढाला है इसे ...

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  24. rajesh ji
    utsahvrdhn ke liye bhut bhut shukriya . aapki aakhiri pnktiya us hr insan ki jban bol rhi hai jo sach me abhi bhut kuchh achchhe pryas emandari se krne ko aatur hai . khi koi bnavt nhi . aisi hi safgoi rchna ko our prakashtha pr phuchati hai .
    aapki our rchnao ka intjar rhega .
    dhnywaad .

    उत्तर देंहटाएं
  25. मरना है एक बार मरने से पहले जीना सीखले
    गुलमोहर के वाबत दुष्यंतजी ने भी कहा था
    जिये ंतो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
    मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिये

    उत्तर देंहटाएं
  26. jeevan ke har bimb ko chhooti hui ankahi kamnaye darshati hui aapki kavita jeevan ke naye aayamo ko chhoo rahi hai....

    उत्तर देंहटाएं

गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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