मंगलवार, 17 सितंबर 2013

प्रेम

प्रेम
समय की टहनी
पर खिला गुलाब है
 
भर सको
तो भर लो
आंखों में उसके रंग
फेफड़ों में सुंगध
झड़ जाएंगी
पखुंडि़यां प्रेम की।

प्रेम
जल है
बहती नदी का
अंजुरी भर प्रेमजल से
धोओ अपनी आंखें
अपना चेहरा और आत्‍मा भी
प्रेम पवित्र करता है

प्रेम
दरअसल
व्‍यक्‍त करने की नहीं
महसूसने की चीज है।

             0 राजेश उत्‍साही
(2000 की किसी तारीख को। उसे समर्पित जिसने इस कविता को पढ़कर मुझे फोन किया और कहा कि बहुत सुंदर है। जिसने यह कहा वह भी कम सुंदर नहीं है।)

6 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. प्रेम पर बहुत सुंदर और सही टिपण्णी की आपने . बधाई

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. एक स्तरीय कविता। विषय जितनी ही अर्थपूर्ण और सरस.
    विजयदशमी की शुभकामनाएं।

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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