गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

परिचित-अपरिचित



परिचित
जगहों में
लोग अपरिचितों की तरह बरतते हैं

टकराते हैं
अपरिचित
जगहों पर
तो परिचितों की तरह मिलते हैं।
0 राजेश उत्‍साही 

3 टिप्‍पणियां:

  1. विदेश में हम सभी भारतीय की तरह मिल लेते हैं.. मगर भारतवर्ष में आकर सम्प्रदाय, जाति, उपजाति आदि में विभक्त हो जाते हैं!! सही कहा है आपने!!

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  2. सचमुच इन्सान को रंग बदलते देर नहीं लगती...जहाँ जैसा स्वार्थ सिद्ध होता हो वहाँ वैसा रुख सहज ही अपना लेता है

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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