रविवार, 11 अगस्त 2013

नागपंचमी




याद आया कि
भुंसारे भुंसारे अम्‍मां
गई होंगी खोजने गाय का
ताजा गोबर
उससे बनाएंगी वे दरवाजे की दीवार पर
नागदेवता की आकृति

याद आया कि
कबीर और उत्‍सव की परंपरा में  
पूजा और आस्‍था
पूछेगीं दादी से जब इसके बारे में
तो बताएंगी वे
कुल देवता हैं अपने ये करूआ खांजा बब्‍बा

याद आया कि
रखेंगी कटोरी में दूध
चने और चिरोंजी का प्रसाद
लगाएंगी आवाज
नारियल फोड़ने के लिए  

याद आया कि
अम्‍मां कहेंगी ऊंची आवाज में
कि तवा नहीं चढ़ेगा आज रसोई में

याद आया कि
अपन तो रंगीन पेंसिल से
ही बना देते थे नागदेवता की मुस्‍कराती आकृति
कि महाशय हमेशा डराते ही रहते हो
कम से कम आज तो मुस्‍करा लो
अब गोबर खोजने कौन जाए
और वह मिलेगा कहां

याद आया कि
कुछ दिनों बाद
अम्‍मां कटोरी लिए
कह रही होंगी,
अरे ये नागपंचमी का प्रसाद
खाकर खत्‍म करो ।
0 राजेश उत्‍साही 

7 टिप्‍पणियां:

  1. याद आई अम्मा तो जीवंत हो गया पूर परिवेश... जी गया त्यौहार!

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  2. नाग पंचमी पर इतनी सुंदर कविता...जैसे बिन मनाये ही त्योहार मन गया..बधाई !

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  3. हदयस्पर्शी । यह कविता है 'राजेश उत्साही' की ।

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  4. अब तो नागपंचमी का स्वरुप ही बदल गया है पहले जैसा कुछ नहीं ....बहुत बढ़िया यादें ....ऐसे ही पल में भूले बिसरे दिन रह-रह कर याद आते हैं।।।

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  5. आज के नाग ...एक दम अलग ही रूप में हैं

    स्‍वतंत्रता दि‍वस की शुभकामनाएँ

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  6. अब अगर अम्माँ आएँ भी तो कहाँ मिलेगा गोबर ,पता नहीं क्या करेंगी अम्माँ! -कहेंगी कुछ नहीं , जो है वही स्वीकारो कह कर कुल देवता से क्षमा माँग लेंगी ! !

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  7. kuch likha h,thoda waqt dekr pdhe or margdarshan de...,,,nadaanummidien.blogspot.com

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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