सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

प्रेम : एक निवेदन


तुम
अपने द्वार पर लगे
पौधों को रोज देती हो पानी
सींचती हो
ताकि वे-
कुम्‍हला न जाएं,मुरझाएं न
खिले रहें।

तुम
अपने द्वार पर लगे
पौधों को रोज
दुलारती हो
झाड़ती हो धूल उनकी
बीनती हो कूड़ा-करकट क्‍यारी से,
ताकि वे-
महसूस न करें,एकाकीपन ।

तुम
अपने द्वार पर लगे
पौधों को रोज
देती हो पोषक तत्‍व,
ताकि वे-
फूलें-फलें
शोभा बढ़ाएं द्वार की
सुंगधित करें वातावरण।

तुम
अपने द्वार पर लगे
पौधों को रोज
संभालती हो,
गिरते हुओं को देती हो सहारा
डालियों को देती हो दिशा
ताकि वे-
बढ़ती रहें सही राह पर।

मुझे भी
अपने द्वार का
एक पौधा मान लो न । 
  0 राजेश उत्‍साही

26 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! क्या बात कही है…………प्रेम निवेदन का सुन्दर अन्दाज़्।

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  2. क्या बात है बाबा भारती जी! अब इसे वासंती बयार का असर कहें या माघ में फगुनहट.. या फिर कहें कि आप फरवरिया गये हैं!!
    जबर्दस्त रोमाण्टिक कविता है!! पुष्प की अभिलाषा तो पढी थी, अभिलाषा के पुष्प आपने खिला दिये!!

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  3. वाह ...बहुत ही खूबसूरत शब्‍दों का संगम है इस रचना में ...

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  4. वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

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  5. dwaar ka paudha ... mujhe lagta hai us tum ne aapko ghar maana hai tabhi dwaar ke paudhe ko sanwarti hai, dularti hai, sinchti hai.... bahut hi badhiyaa

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  6. wah.........bhaiya...aapko to Forest department me hona chahiye..:D
    apart from joke...bahut pyari rachna...sach me kahan se aapne apne ko jor diya..!

    बसंत पंचमी के अवसर में मेरी शुभकामना है की आपकी कलम में माँ शारदे ऐसे ही ताकत दे...:)

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  7. वसंती रंगो से सराबोर खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    आपको वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
    सादर,
    डोरोथी.

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  8. राजेश भाई काफी दिनों बाद आपकी यह कविता आई है.. 'काफी दिनों' वास्तव में अपने ऊपर ही व्यंग्य है क्योंकि जो लोग विशुद्ध साहित्य नहीं लिखते हैं उनके रचना सृजन का प्रवाह अपेक्षाकृत काफी तेज़ होता है.. रोज़ नई पोस्टें होती हैं.. नई कवितायें.. आप मुझे ऐसा करने से रोकते भी हैं क्योंकि मेरी कविताओं में आपको सम्भावना दिखती है.. खैर.. मैं आपके मानदंड पर उतर नहीं पाता...
    ... छोकरा १, २, ३, ४ और उस से पहले गाँधी जी और फिर बीच में आपके कुछ संस्मरण पढने के बाद मैं उन्हें 'आपकी तरह समीक्षक की दृष्टि' से देखता था लेकिन कभी कुछ कोई ढीला छोर नहीं मिला.. कभी भी नहीं... और अभी ... आपके रचना व्यक्तिव (जो कि आपकी रचनाओं और आपसे हुई कुछ चैट वार्ता से बनी है) से बिल्कुल अलग एक प्रेम .. विशुद्ध प्रेम कविता... कितने कम शब्दों में .. कितनी सहजता से कितना सामान्य विम्ब उठा कर अपनी बात कह गए हैं आप.. हर रोज़ कोई लड़की कोई औरत.. अपने गमलो.. अपनी क्यारियों को सवारती है... एक दैनिक और सामान्य सी चर्या को आपने कितना रोमांटिक बना दिया... शायद कविता यही है... कोई बेवजह शब्द नहीं.. कोई आडम्बर नहीं.. कविता हौले से मन के भीतर जा बसती है... यह कला शायद कोई सीख नहीं सकता.. नैसर्गिक होता होगा... सादर !

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  9. बहुत सहज,सरल और स्वाभाविक ढंग से लिखी गयी सुन्दर कविता...
    बिना किसी आडम्बर के ...सीधे दिल से निकली -दिल तक पहुँचती रचना.
    आदरणीय राजेश जी '
    लेखनी प्रणम्य है !

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  10. आपने मनोभावों को खूबसूरती से पिरोया है। बधाई।

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  11. प्रणाम !
    बेहद ही सुन्दरता से अपने प्रेम का इज़हार किया है . सुंदर अभिव्यक्ति .
    साधुवाद !

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  12. प्रेम का नया अंदाज़
    पर अहसास वही खूबसूरत सा है...

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  13. बड़ी प्यारी कविता है।
    प्रेम निवेदन स्वीकार हो जाय यदि हममें पौधों की तरह वृक्ष की संभावना हो। वृक्ष से बड़ा प्रेमी संसार में दूसरा नहीं दिखता।

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  14. तुम
    अपने द्वार पर लगे
    पौधों को रोज
    संभालती हो,
    गिरते हुओं को देती हो सहारा
    डालियों को देती हो दिशा
    ताकि वे-
    बढ़ती रहें सही राह पर।

    मुझे भी
    अपने द्वार का
    एक पौधा मान लो न ।
    ..बहुत गहरी जीवंत रचना जो एक जीवंत चित्र उपस्थित कर मन को आंदोलित कर बहुत कुछ कह जाता है ....सुन्दर रचना के लिए हार्दिक शुभकामना

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  15. मुझे भी
    अपने द्वार का
    एक पौधा मान लो न ।

    वाह ...बहुत ही खूबसूरत सा अहसास है, इन पंक्तियों में आभार इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये ।

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  16. issse khoobasoorat prem nivedan ho hi nahi sakata......bahut khoob....

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  17. मन को छूते शब्‍दों का संगम ..यह अभिव्‍यक्ति ।

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  18. वाह एक अलग ही अंदाज़....
    खूबसूरत रचना...
    सादर बधाई....

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  19. RAJESH JI, AAPKI YAH KAVITA JULY 1981 ME PRAKASHIT KI EK COPY AAJ BHI MERE SANGRAH ME MOUJOOD HAI. YAH KAVITA SOONDARTA KA SABOOT HAI. @ SMS UDAY TAMHANEY. BHOPAL.
    TO 9200184289

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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