मंगलवार, 16 नवंबर 2010

चमकाता है छोकरा : दो

                   'हमकलम' में  इस कविता के लिए रेखांकन :कैरन हैडॉक
छोकरा
कंधे पर,कुहनी में या फिर
पीठ पर
लटकाए रहता है एक झोला
काले धब्‍बों वाला बेडौल झोला

झोले में
बिल्‍ली छाप पालिश होता है
चेरी ब्‍लासम की डिब्‍बी में
काला और लाल

ब्रश होते हैं
मोटी और पतली नोकों वाले
नरम और सख्‍त बालों वाले
होते हैं कुछ
पुराने कपडे़ झोले में

उतरी हुई
स्‍कूल यूनीफार्म पहने
किसी की
घूमता रहता है
बस अड्डे,रेल्‍वे स्‍टेशन
बाग या भीड़ में

उसकी नजरें ढूंढती हैं
सिर्फ चमड़े के चप्‍पल-जूते

वाले पैर
ढेर सारे पैर

पैरों पर टिका होता है
उसका अर्थशास्‍त्र
मां को देने के लिए
बाप को दिलाने के लिए शराब
और अपनी शाम की पिक्‍चर का बजट

हर वक्‍त
देखता है छोकरा नीचे
देखता है पैरों की हरकत
बोलता है बस एक वाक्‍य
साब पालिश, बहिन जी पालिश

कुछ खींच लेते हैं
पैर पीछे
कुछ बढ़ा देते हैं
पैर आगे

वह उतारता है
सलीके से चप्‍पल पैर से
पैर से जूते
साफ करता है
धूल-मिट्टी ऐसे
जैसे साफ करती है मां
उसका चेहरा

वह चमकाता है
जूते को,चप्‍पल को
और बकौल चेरी ब्‍लासम के
साब की किस्‍मत को

कहता है लीजिए साब
देखिए अपना चेहरा
साब झुककर देखते हैं अपना
चेहरा जूते में

थूक देता है
छोकरा
साब के चेहरे पर
जूते में
और फिर चमकाने लगता है
जूता

जूता
चमकाता है छोकरे को
छोकरा
चमकाता है जूते को


छोकरा
कंधे पर,कुहनी में या फिर
पीठ पर
लटकाए रहता है एक झोला
काले धब्‍बों वाला बेडौल झोला
0
राजेश उत्‍साही
(छोकरा : एक पढ़ने के लिए यहां जाएं।)

15 टिप्‍पणियां:

  1. थूक देता है
    छोकरा
    साब के चेहरे पर
    जूते मे

    गज़ब कर दिया और यहीं सारी कविता का निचोड उतर आया है।

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  2. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम इस प्रस्‍तुति में ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. छोकरे के बहाने आप एक अलग दुनिया से परिचय करा रहे हैं.. एक ऐसी दुनिया जो भीख नहीं मांगती.. हाथ नहीं फैलाती .. उद्यम करती है.. अपने भीतर एक छोकरे को पा रहा हूँ मैं..

    उत्तर देंहटाएं
  4. उस छोकरे की जगह दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक स्वचालित मशीन ने ले ली है... पता नहीं एक बच्चे का रोज़गार छिना या ग़लाज़त से छुटकारा मिला. जूते पर थूकता वो साहब के मुँह पर थूकता है में सारा आक्रोश थूक दिया है आपने.. और अंत में एक और ग्लैमरस तस्वीर इस छोकरे की जो कहता है मैं आज भी फेंके हुये पैसे नहीं लेता और सैकड़ों लोग तालियाँ बजाने लगते हैं! झूठे सपने भी कितना खुश कर जाते हैं लोगों को.
    बाबा भारती जी! चलने दीजिये ये छोकरा ऋंखला, कम से कम जैसे सम्वेदनशील लोग अपना चेहरा देख सकें उस ग़लीज आईने में!!

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  5. जूता चमकाता है छोकरे को !!!! बहुत करारा व्यंग्य है ! धूमिल याद आ गये ! आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक साथ बहुत कुछ कहती हुई इस कविता पर क्‍या कहूँ, मुझे ऐसी कविताओं ने हमेशा आकृष्‍ट किया है। मुझे इस छोकरे में कबीर का अनहद नाद सुनाई देता है।
    ये छोकरा एक उदाहरण है कि आत्‍मसम्‍मान के साथ जिंदगी व्‍यतीत करना उतना कठिन नहीं जितना हम मान लेते हैं, इसे सरकारी योजनाओं की दरकार नहीं, व्‍यवसायिक कर्ज के दर-दर भटकने की जरूरत नहीं।

    आपके व्‍यापार को कर्जा बहुत सा चाहिये
    एक डिब्‍बी और ब्रश से जिंदगी वो जी गया।

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  7. छोकरे के साथ आपकी और भी कई कवितायें पढ़ गया। सीधे जेहन में उतर जाने वाली कवितायें हैं आपकी।

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  8. आठवें दशक में कुछ कविताएँ मैंने 'जूता' को केन्द्र में रखकर लिखी थीं। आपकी 'छोकरा'श्रृंखला की इस कविता में:
    थूक देता है
    छोकरा
    साब के चेहरे पर
    जूते मे
    पढ़कर उनकी याद आ गई।
    'जूता'श्रृंखला की एक कविता से कुछ पंक्तियाँ यों हैं:
    जूता, जो चरमराता है
    मर्द का पाँव काट खाता है
    ये उसका अपना तौर है यारो
    ये बग़ावत का दौर है यारो।
    लघुकथा-लेखन पर केन्द्रित हो जाने से कविताएँ लिखना क्योंकि छूट-सा गया इसलिए वे डायरियाँ भी पता नहीं कहाँ हैं? मेरा अनुरोध है कि इस 'छोकरा'श्रृंखला को आगे बढ़ाइए।

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  9. आपके ब्लाग पर एक विशेष कार्य से आई थी -आप के प्रश्न का उत्तर देने .पर पहले पढ़ने बैठ गई और मन ऐसा रमा कि पढ़ती चली गई .धन्य हैं नीमा जी ,और सराहनीय है पत्नी के प्रति आप की दृष्टि जो उन्हें वांछित सम्मान दे सके.आप दोनों का आगे का जीवन बहुत सुख-शान्ति और सफलताओं से परिपूर्ण हो !
    अब आगे बाद में पढ़ूँगी ,जिस काम के लिए आई हूँ वह कर लूँ -(आपने 'शिप्रा की लहरें'-बंधु रे -पर पूछा था ,
    आप घर कब लौट रही हैं। आपकी तरह ही मैं भी घर से बाहर ही हूं। घर लौटने का मन बहुत करता है। पर सब कुछ अपने वश में नहीं है न।

    ३ जुलाई २०१० १०:१३ अपराह्न .)
    मेरे पास उत्तर नहीं था .अब भी पूरा नहीं है फिर भी जितना है - हो सकता है कुछ महीनों में अपने देश लौटूँ .आप के लिए भी कामना करती हूँ कि लौट सकें !
    इतनी देर से उत्तर देने के लिए क्षमा करें .

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  10. यथार्थ की दुनिया में ले जाती है यह रचना ... बिम्ब सा उभरने लगता है आँखों के सामने .... सिम्पली ग्रेट ......

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  11. सच्चाई को वयां करती हुई रचना , बधाई

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  12. जूता
    चमकाता है छोकरे को
    छोकरा
    चमकाता है जूते को

    वाह, उत्साही जी, सशक्त कविता लिखी है आपने।
    मेहनतकश बच्चों के मन को कवि ही पढ़ सकता है।

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  13. Apka kavi man vastav mein kabile tarif hai.Ek sahi satya ko udghatit kiya hai aapne.Dhanyavad.

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  14. शब्द नहीं हैं प्रशंशा के लिए...तिलकराज जी ने जो कहा उसके बाद क्या बचता है कहने को...बेहतरीन रचना...बधाई...


    नीरज

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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