बुधवार, 25 जनवरी 2012

गणतंत्र बनाम गमतंत्र



                                        फोटो : राजेश उत्‍साही
छूटते हुए आसमान
और खिसकती हुई जमीन पर
कब तक खड़ा रह पाऊंगा मैं
अपना संतुलन बनाए
कब तक ?

माना कि मेरे हाथ में है कलम
और स्‍वतंत्र हूं मैं
 चाहे जिस पर लिखने के लिए
पर सवाल यह है 
कि क्‍या
बिके हुए गणतंत्र में
उभर पाएगी मेरी अभिव्‍यक्ति
तुम्‍हारे अखबारी दिमागों में ?
0 राजेश उत्‍साही  

15 टिप्‍पणियां:

  1. गणतंत्र हुआ गनतंत्र, बिका हुआ अखबार, कलम की कुन्द हो चुकी धार,ऐसे में गुम हुआ लोकतंत्र और घुट चुकी है हर अभिव्यक्ति!!

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  2. सच्चाई बयान करती रचना बेहद उत्कृष्ट लेखन...है आपका उत्साही जी
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....!

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  3. उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ......गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना !

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  4. 'अखबारी दिमाग' का प्रयोग लाज़वाब है। वाह!

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  5. आप स्वतन्त्र हैं और जो चाहते हैं लिख सकते हैं । तो गम कैसा । लिखते रहेंगे तो दिमाग में भी बैठेगी ही ।

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  6. कैमरे का उपयोग बखूबी कर रहे हैं आप ।

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  7. सहज शब्‍दों मे सार्थक बात कह दी आपने ..आभार ।

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  8. माना कि मेरे हाथ में है कलम
    और स्‍वतंत्र हूं मैं
    चाहे जिस पर लिखने के लिए
    पर सवाल यह है
    कि क्‍या
    बिके हुए गणतंत्र में
    उभर पाएगी मेरी अभिव्‍यक्ति
    तुम्‍हारे अखबारी दिमागों में ?...उभरे ना उभरे, प्रश्न कैसा ... अपनी आवाज़ रंग लाएगी ही - विश्वास है

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  9. बहुत बढ़िया!!!!!!!!!!!!
    सार्थक रचना.

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  10. आपके इस उत्‍कृष्‍ठ लेखन के लिए आभार ।

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  11. AUB KOI GOOLSHAN N
    UJADE
    AUB WATAN AAJAD HAI.
    UDAY TAMHANE
    BHOPAL

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  12. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  13. Bike huye gantantra mein....tumhare akhbari dimaagon mein....
    ekdam sateek chintrankan..lajawab tasveer ka combination..

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  14. चलाइए क़लम हम बांच लेंगे। पढ़ने पर पाबंदी नहीं है।

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  15. मनोज कुमार ने " गणतंत्र बनाम गमतंत्र " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    चलाइए क़लम हम बांच लेंगे। पढ़ने पर पाबंदी नहीं है।

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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