रविवार, 9 अक्तूबर 2011

परिचय

                                                                          फोटो: राजेश उत्‍साही 

मैं
याद रहूंगा
एक अक्‍खड़,बदमिजाज
और एक हद तक बदतमीज
आदमी की मिसाल के तौर पर

याद रहूंगा
मैं
ऊंची और ककर्श आवाज में
बोलने वाला उजड्ड आदमी

कुछ बनावट ही है
और
कुछ बन जाता है फूलकर
या कि सूजा हुआ बैंगन चेहरा

ऐसे आदमी का
जब भी होगा जिक्र
नाम लिया जाएगा मेरा

धीरे-धीरे
कम होते काले-सफेद
खिचड़ी बाल और बेतरतीब मूंछों के लिए
याद किया जाऊंगा मैं

इन  
तथाकथित खासियतों के बाद भी
जिस किसी को
याद नहीं आऊंगा मैं
उसे ध्‍यान दिलाया जाएगा
मेरे बाएं गाल का सफेद निशान
और दाईं कलाई पर उठा गूमड़

याद करेंगे लोग
कि हमने नहीं सुना उससे
कभी अभिवादन का जवाब  
जिन्‍होंने सुना होगा
वे भी नहीं डालना चाहेंगे 
अपनी याददाशत पर जोर

कहेंगे
लोग कि
हमने नहीं देखा कभी
उसे मद्धम आवाज में बोलते
जो होंगे गवाह इस बात के
वे भी शायद नहीं करेंगे खंडन

याद दिलाएंगे
शायद मकड़ी के जाले
फर्श पर पड़े चाय के निशान
या फिर पेशाबघर से आती गंध
जो खटकते थे मुझ आदमी की आंख में
या कि नाक में

जब भी
टेबिल पर लिख पाएगा
कोई अपना
या अपने प्रिय का नाम
बिना कलम के
तब भी स्‍मृतियों में कौंध जाऊंगा मैं
संभव है कोने में चुपचाप
खड़ी झाड़ू भी पुकार उठे मेरा नाम

निर्देशों और सूचनाओं से विहीन
दीवार बरबस
याद दिलाएगी मेरी
और कुछ लोग 
कुछ न लिखा होने के बावजूद भी 
पढ़ लेंगे वहां

बहुत संभव है
ऐसी और तमाम बातें
होंगी ही याद दिलाने के लिए

शुक्र है
कि किसी न किसी
बहाने याद आऊंगा ही मैं
अक्‍खड़,बदमिजाज और
एक हद तक बदतमीज आदमी।
0 राजेश उत्‍साही
(सन् 2000 के आसपास भोपाल में लिखी गई यह कविता पिछले हफ्ते ऐसा कुछ घटा कि अचानक फिर याद आ गई।)

19 टिप्‍पणियां:

  1. यह कविता कई और लोगों की याद दिला रही है. अच्छी कविता. किन्तु आत्म्कथ्यतामक नहीं है.

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. मैं
    जीवन भर
    कहता फिरता है
    मैं ये हूँ
    मैं वो हूँ
    लेकिन नहीं जान पाता
    अंत तक
    कि मैं क्या हूँ

    दरअसल
    मैं का निर्धारण तो
    दूसरे ही करते हैं।

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  4. याद आएँगी वो कर्मठता - जिसने पहाड़ से रास्ते निकाले और घर को हौसलों की दीवारें दीं...

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  5. हमें तो यही पसंद है ....
    शुभकामनायें !

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  6. सुन्दर बिम्ब प्रयोग....
    सार्थक रचना....बधाई.

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  7. हम तो कहते हैं इंसान याद तो आये……………मगर सुना है यहाँ तो लोग 13 दिन मे ही भूल जाते हैं………………वैसे कविता के भाव बहुत सुन्दर हैं।

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  8. बेहतरीन भावों के साथ सुन्‍दर शब्‍द संयोजन ..आभार ।

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  9. बिना मुखौटे के जीना बहुत हिम्मत का काम है...बिरले ही कर पाते हैं,ऐसा..
    बिलकुल अलग सी रचना...

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  10. हां, किसी भी बहाने से, याद तो किये ही जायेंगे न? उनकी क्या कहें जिन्हें याद रखने का कोई कारण ही नहीं?
    सुन्दर रचना. शुभकामनाएं.

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  11. kisi bhi insaan ke achhe kaam hi yaad rakhe jaate hai, insaan ki shakl bhale hi bhool jaate hai lekin kaam kahan koi bhool paata hai...
    ....der saber hi sahi achhe insaan hamesha yaad aate hain bhale hi we kuch bole nahi....
    chintan-manan karati sundar rachna ke liye aabhar

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  12. कल 19/10/2011 को आपकी कोई एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

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  13. अपनी तरह की एक अलग और तुनक मिज़ाज कविता....


    अंतत: किसी न किसी बहाने रो याद आऊंगा - चाहे अक्खड और बदमिज़ाज़ आदमी की तरह ही

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  14. RAJESH UTASAHI JI, AAP AISE KYO HAI? HA ! UDAY TAMHANEY. BHOPAL.

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  15. "GOOLMOHAR" GUR HAMAARAA NAAM HOTA, HUME BHI "HAJAARO" PADHTE. @ UDAY TAMHANEY. BHOPAL.

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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