शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

पेड़ सहजन का : राजेश उत्‍साही

                    
घर के
पिछवाड़े
था पेड़ सहजन का
था इसलिए कि गए हफ्ते
काट डाला गया

पेड़
था सहजन का
पंद्रह साल से
खिड़की के सामने
महसूस होती थी
डालियों की फरफराहट
आंखों में भर भर आती थी
नन्‍हीं पत्तियों की हरियाली
जब तब नन्‍हें सफेद फूल
बिछ जाते थे पैरों तले

कहने को
ऊंचा-पूरा  
मगर झाड़ी और पौधे से भी
नाजुक
डालियां कमजोर इतनी
कि जरा वजन से ही टूट जाएं

सहजन
किसने रखा होगा नाम
पता नहीं

वह
खड़ा था
आंगन में
बावजूद इसके
कि बिलकुल करीब था
पेड़ नीम का
अपने विशाल विस्‍तार के साथ

नीम
स्‍वभाव के अनुरूप
फैलाता अपनी शाखाएं चारों ओर
जा पहुंचा था
घर की छत पर

कमजोर डालियां झुकती रहीं नीचे
मजबूत उठती गईं ऊपर
जमीन के
अंदर ही अंदर फैलती रहीं मजबूत जड़ें
सहजन
रहा सीधा ही
बढ़ता अपने सिर की दिशा में

नीम पर
बने घोंसले,मधुमक्खियों के छत्‍ते
गिलहरियों के कोटर
अटकी
बच्‍चों की पतंग

सहजन
रहा गिलहरियों की
चहलक‍दमियों का मैदान भर
हां,फलियां थीं
उसकी स्‍वादिष्‍ट
दाल में पकतीं थीं साल में
दो-चार बार बस

एक दिन लगा सबको
नीम और सहजन
रोक रहे हैं धूप
आंगन रहने लगा है लगातार गीला
सीलन भरा

पत्तियां सड़कर फैला रहीं हैं दुर्गंध
सुझाव आने लगे
छंटाई कर दी जाए
कर दिया जाए कद छोटा

घर के कोने में
कुल्‍हाड़ी खड़ी थी उदास
बहुत दिनों से
सुनकर
विध्‍वंस की बात
मचल उठी चलने के लिए

फाल पर उसकी
चमक आ गई
हत्‍थे को ठोक ठाककर
आ खड़ी हुई नीम के सामने

नीम मुस्‍कराया
अगले ही क्षण
नीम की कठोरता के सामने
पड़ गई कुल्‍हाड़ी निढाल
ढीला पड़ गया हत्‍था

पलटकर
आ खड़ी हुई
सहजन के सामने
लौट आई मूल रूप में
और फिर चलने लगी
सहजन के नाजुक शरीर पर
 
घपाघप
देखते ही देखते
पन्‍द्रह या शायद उससे भी
अधिक साल पुराना
सहजन का पेड़
धराशायी हो गया

नीम
अब भी खड़ा है
यद्यपि खोई हैं कुछ
शाखाएं उसने

सोचता हूं
क्‍या हूं मैं
पेड़ सहजन का
या कि नीम का

बहरहाल
न बन सकूं नीम तो न सही
कम से कम से
सहजन
नहीं होना चाहता हूं मैं।               ‍
 (2000 के आसपास रचित,संपादित 2010, www.srijiangatha.com में अप्रैल,2010 में पहली बार प्रकाशित)

8 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचना ! सदैव सबल का वार निरीह और नाज़ुक पर ही क्यों होता है ? जो विरोध न कर पाए, मौन हो हर प्रहार को स्वीकार कर ले क्या संसार में उसका कोई पैरोकार या हितैषी नहीं होता ? एक मर्मस्पर्शी प्रस्तुति ! बधाई और आभार !
    http://sudhinama.blogspot.com
    http://sadhanavaid.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. सीधे पेड़ सबसे पहले काट दिए जाते हैं।
    और काटने वाले अपनी ही भावी पीढहिओं
    के विध्वंसक हैं।
    हमारे शास्त्रों में हरे पेड़ को काटना ,
    युवा पुत्र की हत्या के सामान पाप माना गया है।

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  5. बहुत ही सुन्दर रचना. पसंद आई.

    उत्तर देंहटाएं
  6. कविता पहले भी पढी गई है।कोई काटने ही खडा हो जाए तो क्या सहजन और क्या नीम...।पर आपको तो बरगद कहा जाना चाहिये अडिग संकल्प के चलते....।

    उत्तर देंहटाएं
  7. rajesh ji ,sahajan nahi hona chahta ,me nihit aprajey jijeevisha aur astitva ke prati samvedana dil ko chhuti hai .sachmuch kamjor logon ko apni jaden failane ka haq kam hi milata hai....

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  8. YAAD AA GAYA WAH SAHAJAN KA PED AUR NAG-NAGIN KI CHAHAL KADMI.DOOKHAD HAI HARE BHARE PED KA KATANA. AAPNE ACHCHHA PRATIK BANAYA. DHANY HO. SMS UDAY TAMHANEY. BHOPAL. TO 9200184289

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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