सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

तुम न जाने कहां खो गए


तुम न जाने कहां खो गए


तुम लिखकर अपनी कहानी

स्‍मृति के पन्‍नों पर सो गए



उषा की मधुर बेला में

सपनों में तुम आते थे

निद्रा से जगने पर पाया

केश मेरे तुम सुलझाते थे

अब खुद ही उलझन हो गए

तुम लिखकर अपनी कहानी

स्‍मृति के पन्‍नों पर सो गए



ग्रीष्‍म की हो भरी दुपहरी

या वर्षा का रिमझिम दिन

या शरद का ठंडा मौसम

क्षण कब कटते थे तुम बिन

कट जाते हैं दिन कैसे हो गए

तुम लिखकर अपनी कहानी

स्‍मृति के पन्‍नों पर सो गए



हर संध्‍या पश्चिम में सूरज

नदिया में जब  डूबता है

अपने नीड़ लौटता हर पंछी

बस पता तुम्‍हारा पूछता है

मीत न जाने किस दिशा गए

तुम लिखकर अपनी कहानी

स्‍मृति के पन्‍नों पर सो गए





मदमाती रातों का चांद

जब जब उगता है अब

शहद सा मीठा स्‍वर तुम्‍हारा

कानों में घुल उठता है तब

साज सभी लयहीन  हो गए

तुम लिखकर अपनी कहानी

स्‍मृति के पन्‍नों पर सो गए

 *राजेश उत्‍साही

(24 सितम्‍बर,1977, संपादित 11 अक्‍तूबर,2009)




10 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  2. UDAY TAMHANE
    RAJESHJI
    BHOPAL ME N SAHI
    BLOG PAR MEEL GAYE.
    UDAY TAMHANE.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर......
    पहली रचना ही इतनी सुन्दर...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. पहली पोस्‍ट का आनंद ही कुछ और होता है..

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपको पढ्न हमेशा ही अच्छा लगा है ...सुंदर रचना .... हलचल का आभार जिसके कारण इस रचना को पढ़ने का अवसर मिला

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  6. बहुत ही सुंदर गीत... वाह!
    सादर बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  7. ब्लॉग की पहली रचना के लिए बधाई. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना, शुभकामनाएँ.

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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