शनिवार, 7 मई 2011

मैंने सोचा

गुजरते हुए
शाहपुरा झील के किनारे से
मैंने सोचा
खड़ा कर दूं स्कूटर एक तर
और उतर जाऊं
झील के अन्दर
कपड़े पहने-पहने ही

आसपास कोई नहीं है
हां सड़क पर आवागमन जारी है
सब अपनी धुन में हैं
किसे फुरसत है इधर-उधर देखने की

सोचा कैसे होगी
मेरी शिनाख्त
प्लास्टिक मढ़ा या कि चढ़ा
कोई आइडिंयेटी कार्ड नहीं है जेब में
हां लायसेंस जरूर है
पर वह तो पानी में गल चुका होगा
उस पर लिखे अक्षर घुल चुके होंगे

पेंट की पिछली जेब में
रखी डायरी
भी हो चुकी होगी तार-तार
और शायद उसके पन्ने भी
पानी की सतह पर उतरायेंगे
मेरी ही तरह
कुछ समय बाद

झील के किनारे
खड़ा रहेगा
बदरंग स्कूटर कुछ समय यूं ही
फिर खटकने लगेगा
लावारिस की तरह हर 
आने-जाने वाले की आंख में

फिर कोई राह चलता
भला मानुष
इत्तला कर देगा
थाने में फोन पर

आएगी पुलिस
पूछताछ करेगी
आसपास
फिर तोड़ेगी डिक्की
उसमें से निकलेंगे कागज
गाड़ी के
जिनमें होगा नाम पता मेरा
तब तक धंस चुका होऊंगा मैं
झील की गहराई में

गुजरते हुए
शाहपुरा झील के किनारे से
मैंने सोचा!
(ये सोच भी अजीब शह है। हम जब सोचना शुरू करते हैं तो क्‍या-क्‍या सोच लेते हैं। यह कुछ बरस पहले की अभिव्‍यक्ति है। शाहपुरा झील भोपाल में है। जब यह कविता दोस्‍तों को पढ़वाई तो कुछ अजीब सी प्रतिक्रिया हुई। जवाब में तीन-चार कविताएं और निकल आईं। वे बाद में।) 
                                        0 राजेश उत्‍साही

30 टिप्‍पणियां:

  1. soch kee prakriya chalne lagti hai to koi naya raasta mil jata hai .... bahut hi achhi rachna lagi

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  2. सोच के लिए कोई लगाम नहीं होती ...

    जिंदगी के कुछ पल ऐसे भी होते हैं...जब नकारात्मकता हावी होने लगती है...ऐसे में भावुक चित्त को इसी तरह की रचनात्मकता का सहारा लेना चाहिए।

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  3. जब हम सोचना शुरू करते हैं तो क्या-क्या सोच लेते हैं...
    बेहतर...

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  4. सही कहा...मन और इच्छाएं इसी तरह भटकाती हैं।

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  5. सोच का कोई अन्त नही होता।

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  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (9-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. soch to jane kaha kaha pahunch jati hai shukra hai man ka ankush hota hai is soch par...

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  8. शाहपुरा झील की अतल गहराई के समान कल्पना... सही कहा आपने ऐसे विचार कई बार मस्तिष्क में आते हैं.. अगली कविताओं की प्रतीक्षा रहेगी!!

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  9. अदभुद कविता.. सुबह से कई बार पढ़ चूका हू.. हर बार अलग दृष्टि मिली है.. अलग अर्थ मिला है...

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  10. बेवजह इंसान क्या -क्या सोच जाता है ,तभी तो रचनाएँ बनती हैं लाजवाब भी !

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  11. न जाने इंसान कब क्या क्या सोच जाता है ...अच्छी प्रस्तुति

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  12. राजेश जी ... सोच सच में चलती रहती है पता ही नही चलता ... पर इस सोच को लगाम देना पढ़ता है ....

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  13. उत्साही जी सोच का सिलसिला यूँ ही चलता रहे. बहुत ही सुंदर कविता.

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  14. बहुत ही अच्‍छा लिखा है ... सोच कभी ठहरती नहीं ...अनवरत चलती ही रहती है ।

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  15. कवि भी क्या चीज है!
    डूबने की सोचता है
    डूबता भी नहीं
    कविता उतराने लगती है
    झील में।

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  16. आएगी पुलिस
    पूछताछ करेगी
    आसपास
    फिर तोड़ेगी डिक्की
    .....
    तब तक घंस चूका होऊंगा मैं
    झील के गहराई में ...

    मन में यूँ ही तो कोई भाव नहीं जागता....... आज के परिवेश में चलते फिरते कब कहाँ क्या हो जाय, कोई कुछ नहीं कह सकता..........बेखबर होती दुनिया का सच बहुत ही अनूठे काव्यमयी अंदाज में व्यक्त किया है आपने .. ..आभार

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  17. नकारात्मक सोंच देख आश्चर्य चकित हूँ ! लगता नहीं यह आपने लिखा होगा ...
    बहरहाल आगे ऐसी रचनाये नहीं आएगी ....उम्मीद कर सकता हूँ, आप गुरुजनों में से एक हैं !
    हार्दिक शुभकामनायें !!

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  18. पहली बार जब यह कविता मैंने पढी थी तब मुझे भी कुछ खास नही लगी थी । शायद तब इतना सोचने-समझने का अवकाश ही नहीँ था । लेकिन आज उसे महसूस किया जासकता है ।

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  19. pranam ! kya kahe !
    bhaavabhivyakti ko pure manobhaavo se utaarnaa shrykar hotaa hai .
    sadhuwad .
    saadar

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  20. संघर्ष के उबाऊ क्षणों में कभी-कभी नकारात्मक विचार आते हैं। मुझे भी ऐसे विचार आये थे। ऐसे विचारों से उबरना एक अग्नि-परीक्षा है। ऐसी स्थिति में साहस का मजबूती से दामन थामे रहना चाहिए। कर्मवीरों की यही पहचान है। मुसीबतें अन्तहीन नहीं होती हैं। उन्नति, उत्साह, उमंग का रास्ता उन्हीं के बीच से निकलता है।
    =============================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  21. मन अजीब है ...किस वक्त क्या सोच ले ....

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  22. अलग सी कविता है.....कभी-कभार ऐसे ख्याल आ ही जाते हैं, अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाते...

    पर दोस्तों की ऐसी प्रतिक्रियाएँ भी वाजिब हैं.

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  23. प्रिय उत्साही जी, मैंने कल इस पर जो टिप्पणी लिखी थी वह किसी कारण पोस्ट नहीं हो सकी। क्योंकि कॉपी करके नही रखा था इसलिए पुना:डाली नहीं जा सकी। दोबारा, ज्यों का त्यों कहना-लिखना तो मुश्किल है, मैं बस इतना ही कह सकता हूँ कि इस कविता का सौंदर्य क्षण-विशेष में इसके नायक का नकारात्मक चिंतन ही है और उसी से इसमें जीवन का संचार हो रहा है। इसे लिखकर आपने शाहपुरा झील को अमरत्व प्रदान कर दिया है।

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  24. यंग्‍यकार की कविता पढ़ना अच्‍छा लगा, बलराम जी नें विश्‍लेषण किया उसे पढ़कर कविता को समझने की ललक जागी.

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  25. soch par kisi ka bas nahi... kab kya kya soch ban jaay, lekin aapki kavita mein ek apratksh sachai hai, jo kahin n kahin man ko jhakjor mein samarth hai..... bahut umda rachna ke liye dhanyavaad..

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  26. झील सी गहराई में उतरकर आपने अपनी कल्पना से कविता को रचा है जो सहज व अच्छी लगी।
    सुधा भार्गव

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  27. राजेश जी

    बहुत देर से आपके ब्लॉग पर हूँ , आपकी मृत्यु पर लिखी हुई कविताये बहुत अच्छी लगी . और ये कविता तो बस बहुत ही अच्छी लगी ,... शाहपुरा झील मैं गया हूँ .. बहुत अच्छा लगता है , वहाँ शाम को ..आपकी सोच को सलाम..

    विजय

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  28. RAJESHJI. LAGATA HAI AAPNE MAJAK ME LIKHA HAI. SMS UDAY TAMHANEY. TO 9200184289

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गुलमोहर के फूल आपको कैसे लगे आप बता रहे हैं न....

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